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मकर संक्रांति के दिन इस शुभ मुहूर्त में करें दान, सिर्फ इतनी देर का है महा पुण्य काल

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Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ देशभर में मनाया जाता है. इस दिन को भारत के अलग-अलग राज्यों में अपने तरीकों से मनाया जाता है. शास्त्रों के अनुसार इस दिन का स्नान-दान की दृष्टि से बहुत अधिक महत्व माना जाता है. मकर संक्रांति के दिन किया हुआ दान बहुत पुण्यदायी माना जाता है. इसके अलावा यदि ज्योतिष की दृष्टि से देखा जाए तो जब सूर्यदेव ग्रह गोचर के दौरान मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे मकर संक्रांति कहा जाता है.

मकर संक्रांति हर साल कभी 14 तो कभी 15 जनवरी को मनाई जाती है. ज्योतिषाचार्य व पंडित रमाकांत मिश्रा के अनुसार, सूर्यदेव 14 जनवरी को सुबह 9 बजकर 3 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे. इस साल मकर संक्रांति 14 जनवरी 2025, मंगलवार के दिन मनाई जाएगी. ऐसे में पंडित जी बता रहे हैं कि मकर संक्रांति स्नान और दान का शुभ मुहूर्त क्या है और किस मुहूर्त में स्नान और दान करने से पुण्य फल मिलेंगे.

साल 2025 में 14 जनवरी को है मकर संक्रांति
हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2025 में मकर संक्रांति 14 जनवरी को पड़ रही है और भगवान सूर्य सुबह 9 बजकर 3 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे. इसलिए इस दिन गंगा स्नान और दान पुण्य का समय सुबह 9 बजकर 3 मिनट से शुरु होकर शाम 5 बजकर 46 मिनट पर समप्त होगा. पुण्यकाल का समय 8 घंटे 42 मिनट का रहेगा. इस समयावधि में स्नान व दान करना लाभकारी रहेगा.

मकर संक्रांति महापुण्य काल मुहूर्त
मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी को सुबह 09 बजकर 03 मिनट से लेकर सुबह 10 बजकर 48 मिनट तक महा पुण्य काल रहेगा. महा पुण्य काल की कुल अवधि 1 घंटा 45 मिनट रहेगी. इस मुहूर्त में स्नान-दान व पूजा करना बहुत ही शुभ माना जाता है. हालांकि मकर संक्रांति पर दोनों ही काल पुण्य काल और महा पुण्य काल पर स्नान, दान करना विशेष फलों की प्राप्ति करवाता है.

मकर संक्रांति क्यों है महत्वपूर्ण
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में जाता है और मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब मकर संक्रांति मनाई जाती है. मकर संक्रांति पर गंगा, यमुना समेत दूसरी पवित्र नदियों में स्नान करने से बहुत पुण्य प्राप्त होता है. वहीं अगर मौसम के हिसाब से बात करें तो मकर संक्रांति का त्योहार सर्दियों के अंत को भी दर्शाता है. वहीं कई जगहों पर इसे नई फसल के आने का प्रतीक माना जाता है और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.

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