रीवा: मध्य प्रदेश के रीवा जिले में दशहरे के शुभ अवसर पर 350 साल पुरानी राजगद्दी पूजन की परंपरा को देखने के लिए हजारों लोग रीवा के ऐतिहासिक किले में उमड़े. इस अद्वितीय परंपरा की शुरुआत वर्ष 1617 में हुई थी, जब बांधवगढ़ किले से रीवा किले में इसे पहली बार मनाया गया था. बघेल वंश के 22वें महाराजा विक्रमादित्य सिंह जूदेव ने इस परंपरा की नींव रखी थी, और तब से लेकर आज तक यह रीवा के राजघराने और जनता के बीच एक महत्वपूर्ण और पूज्य आयोजन बना हुआ है.
राजगद्दी पूजन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
रीवा किले में दशहरे के दिन आयोजित होने वाले राजगद्दी पूजन की जड़ें बघेल वंश की शाही परंपराओं से जुड़ी हैं. इस परंपरा के तहत भगवान राम को राजाधिराज के रूप में राजगद्दी पर विराजमान किया जाता है, और विशेष पूजा अर्चना की जाती है. रीवा के वर्तमान राजा, जो बघेल वंश के वंशज हैं, इस अवसर पर शाही पोशाक पहनते हैं और हाथ में तलवार लेकर पूजा करते हैं. इसके बाद वे अपनी प्रजा को संबोधित करते हैं और रावण दहन की ओर प्रस्थान करते हैं.
इस परंपरा की शुरुआत बांधवगढ़ से रीवा के किले में स्थानांतरित होने पर हुई थी. तब से यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है और दशहरे के दिन पूरे रीवा जिले के लोगों के लिए एक विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.
नीलकंठ को आजाद करने की परंपरा
दशहरा के दिन रीवा किले में नीलकंठ को आजाद करने की एक और विशेष परंपरा निभाई जाती है. रीवा के महाराजा के अनुसार, पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम ने कठिन तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नीलकंठ रूप में दर्शन दिए थे. इसीलिए दशहरे के दिन नीलकंठ का दर्शन करना शुभ माना जाता है. मान्यता है कि नीलकंठ के दर्शन मात्र से व्यक्ति के सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं. इस परंपरा को देखने के लिए लोगों में गहरी आस्था है, और हर साल हजारों लोग इसे देखने आते हैं.
राजगद्दी पूजन की खास विधि
राजगद्दी पूजन की विधि विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है. इसमें राज पुरोहित भगवान राम को राजाधिराज के रूप में विराजित करते हैं और शाही परिवार के सदस्य इस अवसर पर पारंपरिक पोशाक में शामिल होते हैं. तलवार को हाथ में लेकर राजा और उनके परिवार के लोग भगवान राम की पूजा करते हैं. इस शाही आयोजन में रीवा के वर्तमान राजा भी अपने पुरखों की परंपरा का निर्वाह करते हुए अपनी प्रजा को संबोधित करते हैं.
इसके बाद रावण दहन का आयोजन होता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग रीवा किले में आते हैं. इस मौके पर राजा के संबोधन को सुनना और फिर रावण दहन के समारोह में शामिल होना, रीवा की जनता के लिए विशेष महत्व रखता है.
दशहरा उत्सव में उमड़े हजारों लोग
रीवा किले में आयोजित होने वाला यह समारोह केवल रीवा ही नहीं, बल्कि आस-पास के जिलों से भी लोगों को आकर्षित करता है. इस साल भी हजारों की संख्या में लोग इस परंपरा को देखने के लिए उमड़े. राजगद्दी पूजन की इस अनूठी परंपरा में शाही परिवार की तलवार और पोशाक विशेष आकर्षण का केंद्र रही. इसके साथ ही नीलकंठ को आजाद करने की परंपरा ने भी लोगों को अपनी ओर खींचा.
निष्कर्ष
रीवा किले में दशहरे के अवसर पर आयोजित होने वाली 350 साल पुरानी राजगद्दी पूजन की परंपरा न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. इस आयोजन में राजघराने की शाही परंपराओं को जीवित रखा गया है, जो रीवा के लोगों के दिलों में विशेष स्थान रखती है. हर साल हजारों की संख्या में लोग इस परंपरा को देखने के लिए यहां इकट्ठा होते हैं और दशहरे के इस महोत्सव का हिस्सा बनते हैं. नीलकंठ को आजाद करने की परंपरा, रावण दहन और राजा का संबोधन इस आयोजन को और भी खास बनाते हैं.
FIRST PUBLISHED : October 13, 2024, 13:50 IST
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