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हर मुसलमान पर नहीं है हज फर्ज! इस्लाम में इन लोगों को दी गई है राहत, जानिए क्या कहता है शरीयत का नियम

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इस्लाम में हज पाँच बुनियादी फराइज में से एक है, जो केवल आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमानों पर फर्ज है. आर्थिक तंगी वाले मुसलमानों को हज ना करने पर कोई गुनाह नहीं माना जाता.

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हर मुसलमान पर नहीं है हज फर्ज़, इस्लाम ने दी है आर्थिक रूप से कमजोरों को राहत.

हाइलाइट्स

  • इस्लाम में हज केवल आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमानों पर फर्ज है.
  • आर्थिक तंगी वाले मुसलमानों को हज ना करने पर कोई गुनाह नहीं.
  • इस्लाम में 5 फर्ज: कलमा, नमाज, रोजा, जकात और हज.

अलीगढ़: इस्लाम धर्म में हज को पाँच बुनियादी फराइज (फर्ज) में से एक माना गया है, जिनमें कलमा, नमाज, रोजा, जकात और हज शामिल हैं. ये पांचों इबादतें हर मुसलमान की जिंदगी का अहम हिस्सा मानी जाती हैं, जिनका अल्लाह ने हुक्म दिया है. हालांकि, इन फराइज में हज एक ऐसा फर्ज है, जो हर मुसलमान पर तुरंत लागू नहीं होता. इसके लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं. अलीगढ़ के हज ट्रेनर मोहम्मद शमशाद अहमद खान के अनुसार, हज केवल उन मुसलमानों पर फर्ज है, जो ‘साहिब-ए-हैसियत’ हों, यानी जिनकी माली हालत इतनी मजबूत हो कि वे हज का सफर और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को आसानी से निभा सकें.

इन लोगों को शरीयत ने दी है रियायत
शरीयत ने इस्लाम में जो लोग आर्थिक तंगी, कर्ज, या किसी अन्य माली कमजोरी का सामना कर रहे हों, उनके लिए विशेष रियायत दी है. ऐसे लोग अगर हज नहीं कर पाते हैं, तो उन पर कोई गुनाह नहीं लिखा जाता और न ही उन पर हज फर्ज़ माना जाता है. जब उनकी माली हालत बेहतर हो जाए, तभी हज उनके लिए फर्ज ठहराया जाता है. इस्लाम की यही खासियत इसे एक रहमदिल और हकीकतपसंद मजहब बनाती है, जो अपने मानने वालों की हालत को देखकर उनसे इबादत की उम्मीद करता है.

ये है इस्लाम में 5 फर्ज
जानकारी देते हुए अलीगढ़ के हज ट्रेनर मोहम्मद शमशाद अहमद खान बताते हैं कि इस्लाम में पांच चीजों को फर्ज कर दिया गया है, जिनमें कलमा, नमाज, रोजा, हज और जकात शामिल हैं. इन पांच फर्जों में से हज उस व्यक्ति या महिला के लिए फर्ज करार दिया गया है, जो साहिब-ए-हैसियत हो, यानी जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो. जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं, कर्ज में डूबे हुए हैं या जिनकी माली हालत बेहद खराब है, ऐसे लोगों पर हज फर्ज़ नहीं है. जब उनकी स्थिति बेहतर हो जाए, तो वे हज कर सकते हैं. ऐसे लोग जिनकी हज जाने के लिए आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, उन्हें गुनाह में शामिल नहीं किया जाता. इस्लाम और शरीयत के कानून में ऐसे लोगों को हज ना करने पर छूट दी गई है.

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