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होलिका दहन में सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को निभा रहा है यह गांव, आज भी राजशाही वेशभूषा में निभाता

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Sikar News: सीकर के पचार गांव में होने वाली होलिका दहन की परंपरा आसपास के क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध है. यहां पर शुभ मुहूर्त निकालने के बाद आज भी राजघराने का परिवार द्वारा होलिका दहन किया जाता है. पचार राजघराने …और पढ़ें

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राजपरिवार द्वारा निभाई जाती है होलिका दहन की परंपरा 

होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है. यह त्यौहार हिंदू धर्म में बहुत विशेष होता है. विधि विधान से पूजा अर्चना करने के बाद ही होलिका दहन किया जाता है. राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग तरीके से होलिका दहन की परंपरा है. शहरी क्षेत्र में पूजा अर्चना करने के बाद सीधा होलिका दहन कर दिया जाता है.

लेकिन कई ग्रामीण क्षेत्रों में सैकड़ो हजारों सालों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए. होलिका का दहन होता है. सीकर जिले के गांव पचार में आज भी सैकड़ो सालों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन किया जाता है. इस गांव में संपूर्ण रीति रिवाज की पालना के साथ होली का त्यौहार मनाया जाता है. होलिका दहन इस गांव किस संस्कृति का हिस्सा है.

राजघराने के लोग पूजा अर्चना के बाद जलाते हैं होली
पचार गांव में होने वाली होलिका दहन की परंपरा आसपास के क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध है. यहां पर शुभ मुहूर्त निकालने के बाद आज भी राजघराने का परिवार द्वारा होलिका दहन किया जाता है. पचार राजघराने का परिवार पारंपरिक वेशभूषा पहनकर होलिका दहन वाली जगह पर पहुंचता है.इस दौरान कटार व तलवार भी उनके हाथ में होती है. होलिका दहन वाली जगह पर पहुंचने के बाद राज परिवार संपूर्ण विधि विधान के साथ मंत्र वचन कर पूजा अर्चना करते हैं. इसके अलावा शुभ मुहूर्त खत्म होने से पहले राज परिवार के सदस्य द्वारा होलिका का दहन किया जाता है. राजघराने से जुड़ी हुई यह परंपरा बहुत विशिष्ट और ऐतिहासिक है.

होलिका दहन की कहानी 
होलिका दहन की कहानी भक्त प्रहलाद, उनके पिता राजा हिरण्यकश्यप और उनकी बुआ होलिका से जुड़ी हुई है. हिरण्यकश्यप एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था. उसने कठोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया कि उसे न कोई मनुष्य मार सकता है, न कोई देवता। न दिन में मरेगा, न रात में, न धरती पर मरेगा, न आकाश में, न अस्त्र से मरेगा, न शस्त्र से. इस वरदान के कारण वह अहंकारी बन गया और खुद को भगवान मानने लगा. उसने अपने राज्य में विष्णु-भक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था.

सैकड़ो साल पुरानी परंपरा को निभा रहा
हिरण्यकश्यप ने कई बार प्रहलाद को मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार विष्णु भगवान ने उसकी रक्षा की. अंततः उसने अपनी बहन होलिका से सहायता मांगी. होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती. वह प्रहलाद को गोद में लेकर जलती हुई आग में बैठ गई. ताकि वह जलकर मर जाए और होलिका सुरक्षित रहे. लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होलिका का वरदान निष्फल हो गया, और वह खुद जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रहलाद सुरक्षित रहा. यह घटना अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक बनी. तभी से होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है. इसे बुराई के अंत और सच्ची भक्ति की विजय के रूप में मनाया जाता है.

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होलिका दहन में सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को निभा रहा है यह गांव, जानें मान्यता

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