ओम प्रकाश निरंजन /कोडरमा: भारत में दुर्गा पूजा के दौरान विसर्जन का आयोजन खास महत्व रखता है, जहां मां दुर्गा की मूर्तियों को विसर्जन के लिए वाहन से ले जाया जाता है. लेकिन झारखंड के कोडरमा जिले के गुमो गांव में माता दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन एक बेहद अनोखी और पुरानी परंपरा के तहत किया जाता है, जिसमें कोई वाहन इस्तेमाल नहीं होता. इस अनूठी परंपरा का निर्वहन पिछले 400 वर्षों से किया जा रहा है, जो इसे खास और अद्वितीय बनाता है.
गुमो गांव की ऐतिहासिक परंपरा
कोडरमा के गुमो गांव में दुर्गा पूजा की शुरुआत करीब 400 साल पहले राजा परिवार के द्वारा की गई थी. इस प्राचीन परंपरा के अनुसार, माता दुर्गा की प्रतिमा को विसर्जन के लिए वाहन का उपयोग नहीं किया जाता है. बल्कि समिति के पदाधिकारी और स्थानीय लोग माता की प्रतिमा को कंधे पर लेकर विसर्जन स्थल तक पहुंचते हैं.
राजा परिवार के समय शुरू की गई यह परंपरा आज भी सतघरवा परिवार और स्थानीय लोगों द्वारा निभाई जा रही है. दशहरा की रात, जब मां दुर्गा की विदाई का समय आता है, तब सुहागिन महिलाएं पहले माता की मांग में सिंदूर भरती हैं, जो उनकी अखंड सौभाग्यवती होने की कामना का प्रतीक है. इसके बाद महिलाएं एक दूसरे की मांग में सिंदूर भरकर आशीर्वाद मांगती हैं.
कंधों पर मां की डोली का सौभाग्य
माता दुर्गा की मूर्ति को विसर्जन से पहले पांच बार दुर्गा मंडप की परिक्रमा कराई जाती है. इस दौरान लोग माता की डोली को अपने कंधे पर लेना अत्यंत सौभाग्यशाली मानते हैं. कंधों पर उठाई गई यह प्रतिमा न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह इस अनोखी परंपरा की महत्ता को भी दर्शाती है. इसके बाद गुमो दुर्गा मंडप से लगभग 700 मीटर की दूरी पर स्थित एक ऐतिहासिक तालाब, जिसे राजा के समय का बताया जाता है, में माता की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है.
राजा के तालाब में विसर्जन की विशेषता
विसर्जन स्थल पर पहुंचने के बाद, सामूहिक रूप से आरती की जाती है और फिर माली द्वारा विशेष विधि से माता की मूर्ति का चूमावन किया जाता है. इस चूमावन में दूध, दही, और दुग्ध घास का उपयोग होता है, जिससे मां को सम्मानपूर्वक विदाई दी जाती है. विसर्जन की यह परंपरा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह गुमो गांव के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर का एक अभिन्न हिस्सा है.
विसर्जन के दौरान आस्था और उत्सव का संगम
विसर्जन के इस अनोखे तरीके में भक्तों की आस्था और उत्साह देखते ही बनता है. लोग माता की जयकारों के साथ उन्हें विदाई देते हैं और आंखों में आंसू लेकर माता से अगले साल फिर से पधारने की विनती करते हैं. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कोई वाहन का उपयोग न करना इस परंपरा को खास और अद्वितीय बनाता है, जो आज भी 400 साल पुरानी इस परंपरा की विरासत को जीवित रखे हुए है.
निष्कर्ष
गुमो गांव में 400 वर्षों से चली आ रही यह अनूठी परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह संस्कृति और इतिहास की अमूल्य धरोहर भी है. बिना वाहन के कंधों पर उठाकर माता दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन करना इस गांव की अनोखी पहचान है, जो आज भी सतघरवा परिवार और स्थानीय लोगों द्वारा निभाई जाती है. यह परंपरा आस्था, समर्पण और भक्ति का अद्वितीय संगम है, जो हर वर्ष दशहरा के दिन माता दुर्गा की विदाई के समय देखने को मिलता है.
FIRST PUBLISHED : October 13, 2024, 13:53 IST
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