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Basant Panchami 2026 : बसंत पंचमी पर पीला रंग पहनना क्यों जरूरी, मिलेगा क्या, शरीर के लिए ये कैसे शुभ, जानें सबकुछ

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नैनीताल. हर साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला बसंत पंचमी का पर्व भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान रखता है. शास्त्रों में इसे वर्ष की सबसे शुभ तिथियों में गिना गया है. मान्यता है कि इस दिन ज्ञान की देवी मां सरस्वती की विधिवत पूजा-अर्चना करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और विद्या, बुद्धि व विवेक का विकास होता है. यही कारण है कि बसंत पंचमी को विद्यार्थियों, शिक्षकों और ज्ञान से जुड़े लोगों के लिए खास माना जाता है. बसंत पंचमी को विद्यारंभ संस्कार, उपनयन संस्कार और विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए भी श्रेष्ठ तिथि माना गया है. परंपरा के अनुसार, इस दिन छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है. पहाड़ों में यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्रकृति और ऋतु परिवर्तन से जुड़ा उत्सव भी माना जाता है.

नई पत्तियां, फूलों पर भौंरे

उत्तराखंड के नैनीताल स्थित डीएसबी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. ललित तिवारी बताते हैं कि बसंत पंचमी को ऋतुराज बसंत का प्रतीकात्मक आगमन माना जाता है. इस दिन के बाद मौसम में धीरे-धीरे बदलाव शुरू हो जाता है. कड़ाके की ठंड कम होने लगती है और वातावरण में गर्माहट के साथ नई ऊर्जा का संचार महसूस किया जा सकता है. डॉ. तिवारी के अनुसार बसंत पंचमी के बाद पेड़ों में नई पत्तियां आने लगती हैं, फूलों पर भौंरों की गूंज सुनाई देने लगती है और खेतों में सरसों के पीले फूल खिल उठते हैं. यह सब प्रकृति में नवजीवन के संकेत माने जाते हैं. पहाड़ी इलाकों में यह बदलाव खास तौर पर साफ नजर आता है, जहां सर्दियों के बाद बसंत का इंतजार लंबे समय से किया जाता है.

क्यों खास है पीला

बसंत पंचमी का सबसे प्रमुख रंग पीला माना जाता है. इस दिन विशेष रूप से पीले वस्त्र पहनने और मां सरस्वती को पीले वस्त्र अर्पित करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पीला रंग मां शारदा को अत्यंत प्रिय है और यह ज्ञान, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है. प्रोफेसर तिवारी बताते हैं कि इसी कारण बसंत पंचमी के दिन पूजा-अर्चना में पीले वस्त्र, पीले फूल और पीले रंग के पकवानों का प्रयोग किया जाता है. उपनयन संस्कार के दौरान भी बटुक को पीले वस्त्र धारण कराए जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि पीले वस्त्र पहनने से मां सरस्वती की विशेष कृपा बनी रहती है और बौद्धिक विकास होता है.

सेहत के लिए भी लाभकारी

धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टि से भी पीले रंग का महत्त्व बताया गया है. प्रोफेसर तिवारी बताते हैं कि पीला रंग मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है और नर्वस सिस्टम को बेहतर ढंग से सक्रिय करता है. यह रंग मन को प्रसन्न रखने में मदद करता है. पीला रंग शरीर में सेरोटोनिन हार्मोन को बढ़ाने में सहायक माना जाता है, जिसे खुशी का हार्मोन कहा जाता है. इससे तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं में कमी आती है. यही कारण है कि बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र पहनने को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी शुभ माना जाता है.

पहाड़ों पर कैसी

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बसंत पंचमी का त्योहार पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाता है. घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं और मां शारदा को भोग लगाया जाता है. बच्चों को पीले रूमाल या वस्त्र आशीर्वाद स्वरूप दिए जाते हैं. इसी दिन से पूस के रविवार से शुरू होने वाली खड़ी होली, श्रृंगार रस की होली में परिवर्तित होने लगती है. गांव-गांव में होली के गीत गूंजने लगते हैं. गेंदे, चमेली और सरसों के पीले फूल खिलकर पूरे वातावरण को रंगीन बना देते हैं.

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