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Purnia SukhSena unique Durga Visarjan tradition for 43 years

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Purnia Durga Visarjan Tradition: पूर्णिया के सुखसेना में 43 वर्षों से आदिवासी पारंपरिक वेशभूषा में दुर्गा विसर्जन पर नृत्य करते हैं. लोग आषाढ़ माह के अरदरा नक्षत्र से ही माता की आराधना शुरू कर देते हैं. विजयादशमी के दिन इस आराधना को संपन्न करते हैं.

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विजयादशमी की अनोखी आस्था! विदाई से पहले नाचते हैं आदिवासी, 43 साल है परंपरापूर्णिया के सुखसेना में माता के विसर्जन में यहां है खास परंपरा 

पूर्णियाः आज विजयादशमी के पावन पर्व पर, जहां पूरे देश में दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन हो रहा है. वहीं पूर्णिया जिले के सुखेसना गांव में एक खास और पुरानी परंपरा देखने को मिली. पिछले 43 वर्षों से यहां स्थापित हो रही मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन के समय आदिवासी समुदाय अपनी अनूठी संस्कृति और भक्ति का प्रदर्शन करता है.

विसर्जन के ठीक पहले है ये परंपरा
यह परंपरा सुखेसना दुर्गा मंदिर परिसर में निभाई जाती है. विसर्जन के ठीक पहले, आदिवासी समुदाय के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा (पोशाक) में ढोल-मंजीरा बजाते हुए मंदिर प्रांगण में पहुंचते हैं. यहां वे मां दुर्गा, तारा और महादेव की विशेष आराधना करते हैं. इस दौरान, वे पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर माता को प्रसन्न करने और उनसे आशीर्वाद लेने का प्रयास करते हैं.

अरदरा नक्षत्र से ही माता की आराधना शुरू
कलाकार अनंत लाल मुर्मू ने इस परंपरा के महत्व को बताते हुए कहा कि वे लोग आषाढ़ माह के अरदरा नक्षत्र से ही माता की आराधना शुरू कर देते हैं. विजयादशमी के दिन सुखेसना दुर्गा मंदिर में आकर इस आराधना को संपन्न करते हैं. मुर्मू ने बताया कि पारंपरिक नृत्य और भक्ति संगीत के माध्यम से वे माता से विसर्जन के बाद विश्राम के लिए प्रार्थना करते हैं. यह अटूट परंपरा वर्ष 1981 से लगातार निभाई जा रही है.

1981 ईस्वी से यहां पूजा शुरू हुई
दुर्गा मंदिर पूजा कमिटी के अध्यक्ष शारदानंद मिश्र ने बताया कि जब से यानी 1981 ईस्वी से यहां पूजा शुरू हुई है. तभी से यह आदिवासी परंपरा चली आ रही है. आदिवासी भाइयों का पारंपरिक नृत्य यहां के उत्सव का एक अभिन्न अंग है, जो धर्म और संस्कृति के समन्वय को दर्शाता है. विसर्जन के मौके पर सुखेसना में भव्य ग्रामीण मेला का भी आयोजन किया गया है. बड़ी संख्या में ग्रामीण और दूर-दराज से आए लोग इस मेले को देखने और विशेष रूप से आदिवासी नृत्य की अद्भुत झांकी को देखने के लिए पहुंचे. यह अनूठी परंपरा आस्था, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द की मिसाल पेश करती है.

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विजयादशमी की अनोखी आस्था! विदाई से पहले नाचते हैं आदिवासी, 43 साल है परंपरा

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