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Ayodhya 84 Kosi Parikrama: राम नगरी अयोध्या से निकली 84 कोसी परिक्रमा यात्रा, जानें कैसे हुई परिक्रमा की शुरुआत, महत्व और पूरी जानकारी

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Ayodhya 84 Kosi Parikrama: भगवान राम की जन्म स्थली अयोध्या से 84 कोसी परिक्रमा की शुरुआत हो चुकी है. 21 दिन तक चलने वाली यह यात्रा आध्यात्मिक साधना और मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती है. मान्यता है कि …और पढ़ें

अयोध्या से निकली 84 कोसी परिक्रमा, जानें कैसे हुई परिक्रमा की शुरुआत और महत्व

राम नगरी अयोध्या से निकली 84 कोसी परिक्रमा यात्रा

हाइलाइट्स

  • 84 कोसी परिक्रमा यात्रा अयोध्या से शुरू हुई.
  • यात्रा 21 दिनों तक चलेगी और 275 किमी की होगी.
  • परिक्रमा से मोक्ष और बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है.

धर्मनगरी अयोध्या से रविवार को 84 कोसी परिक्रमा यात्रा का शुभारंभ हो गया है. धर्मार्थ सेवा संस्थान और ठाकुर नरोत्तम भगवान ट्रस्ट के तत्वावधान में यह यात्रा निकाली गई है. अयोध्या के नरोत्तम भवन, रायगंज से साधु-संतों का एक विशाल जत्था परिक्रमा के लिए रवाना हुआ. परिक्रमा यात्रा की शुरुआत मखोड़ा धाम के लिए हुई, जो भगवान दशरथ द्वारा त्रेता युग में यज्ञस्थल के रूप में प्रसिद्ध है. श्रद्धालु पहले सरयू तट तक पैदल पहुंचे और वहां से वाहनों द्वारा मखोड़ा धाम के लिए प्रस्थान किया. मान्यता है कि इस यात्रा में शामिल होने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु उपरांत बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है. आइए जानते हैं 84 कोस परिक्रमा का महत्व…

21 दिन तक चलेगी 84 कोसी परिक्रमा
बताया गया कि 14 अप्रैल दिन सोमवार को सुबह पांच बजे 84 कोसी परिक्रमा का विधिवत शुभारंभ हो गया है, जो 21 दिनों तक चलेगी. यह यात्रा अयोध्या, बस्ती, अंबेडकर नगर, बहराइच, और गोंडा जिलों की सीमाओं से होते हुए 4 मई को मखोड़ा धाम पहुंचेगी. 5 मई को यात्रा का विश्राम अयोध्या के सरयू तट पर होगा और 6 मई को रामकोट में विशाल महायज्ञ और पैगाम मार्च के साथ समापन किया जाएगा. 21 दिनों तक जगह जगह हनुमान चालीसा, भजन-कीर्तन और सुंदरकांड के पाठ भी किए जाएंगे.

84 कोसी परिक्रमा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 84 कोसी परिक्रमा की यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है. शास्त्रों के अनुसार, इस परिक्रमा को मन, वचन और कर्म से पूरा करने वाले को पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है, यही कारण है कि देशभर से श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं. इस यात्रा में शामिल होने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान राम जिस मार्ग से वनगमन करते हुए ऋषि-मुनियों के आश्रमों में गए थे, उन्हीं पथों को जोड़कर यह 84 कोसी परिक्रमा निर्धारित की गई है. इस परिक्रमा के करने से सभी मनोकामना पूरी होती हैं और सुख-शांति और समृद्धि में वृद्धि होती है.

परिक्रमा करने से होती है मोक्ष की प्राप्ति
अयोध्या में तीन तरह की परिक्रमा होती हैं, पहली परिक्रमा छोटी परिक्रमा कहलाती है, जो 5 कोस की होती है. दूसरी 14 कोसी परिक्रमा और तीसरी 84 कोसी परिक्रमा, जो करीब 275 किमी. की होती है. अयोध्या की चार शास्त्रीय सीमाएं इस परिक्रमा में विशेष महत्व रखती हैं. उत्तर दिशा में मखोड़ा धाम (उत्तरी फाटक), पूर्व दिशा में सिंह ऋषि का आश्रम (पूर्वी फाटक), दक्षिण दिशा में महाराज परीक्षित का आश्रम (दक्षिणी फाटक) और पश्चिम दिशा में अगस्त्य मुनि का आश्रम, भंवरीगंज, गोंडा (पश्चिमी फाटक) हैं. यह चार दिशाएं अयोध्या की आध्यात्मिक सीमाएं मानी जाती हैं. हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस परिक्रमा में भाग लेते हैं और इस बार भी लगभग 1500 श्रद्धालु यात्रा में शामिल हुए हैं. यह यात्रा पूरी तरह से धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक साधना और मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती है.

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अयोध्या से निकली 84 कोसी परिक्रमा, जानें कैसे हुई परिक्रमा की शुरुआत और महत्व


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