Mata Lakshmi Chalisa : धन, समृद्धि और सुख-शांति की देवी, माता लक्ष्मी हिन्दू धर्म में अत्यंत पूजनीय देवी मानी जाती हैं. उन्हें वैभव, ऐश्वर्य और ऐक्य के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. घर, कार्यस्थल और व्यवसाय में सफलता की प्राप्ति के लिए माता लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है. इनकी कृपा से मनुष्य को न केवल भौतिक समृद्धि मिलती है, बल्कि मानसिक शांति और संतोष भी प्राप्त होता है. माता लक्ष्मी चालीसा, माता लक्ष्मी की स्तुति में लिखा गया एक धार्मिक गीत है. इसमें माता के व्यक्तित्व, उनके गुण और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन किया गया है. यह चालीसा सरल शब्दों में रची गई है, जिससे कोई भी व्यक्ति इसे आसानी से पढ़कर या सुनकर माता की भक्ति में लीन हो सकता है.
माता लक्ष्मी की भक्ति से घर में खुशहाली, आर्थिक स्थिरता और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है. चालीसा का पाठ विशेष रूप से शुक्रवार या दीपावली के अवसर पर किया जाता है. इससे नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि का वातावरण बनता है. साथ ही, इसे नियमित रूप से पढ़ने से मानसिक तनाव कम होता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है.
माता लक्ष्मी चालीसा का महत्व
माता लक्ष्मी चालीसा का उद्देश्य केवल माता की स्तुति करना ही नहीं है, बल्कि यह भक्त को नैतिकता, परिश्रम और सदाचार की ओर भी प्रेरित करती है. चालीसा के प्रत्येक श्लोक में माता के दिव्य रूप और उनके प्रभाव का विवरण मिलता है. इसे पढ़ने वाले व्यक्ति को विश्वास, श्रद्धा और अनुशासन की सीख मिलती है.

धन और समृद्धि के प्रतीक माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए चालीसा का पाठ अत्यंत लाभकारी माना गया है. पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इसे प्रतिदिन पढ़ने से आर्थिक संकट समाप्त होते हैं और नए अवसर खुलते हैं. माता की भक्ति से मन में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति अपने जीवन में नयापन अनुभव करता है.
पाठ करने का तरीका
माता लक्ष्मी चालीसा का पाठ सुबह के समय या शाम के समय किया जा सकता है. पाठ के दौरान शांत और निर्मल वातावरण होना आवश्यक है. घर में दीपक जलाकर और कुछ फूल चढ़ाकर पाठ करने से माता की कृपा अधिक होती है.
भक्तों को यह ध्यान रखना चाहिए कि चालीसा का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ करना चाहिए. इसका प्रभाव तभी पूर्ण रूप से दिखाई देता है जब पाठ करने वाला व्यक्ति माता के प्रति सच्ची भक्ति और अपने कर्मों में ईमानदारी रखता हो.
.. दोहा ..
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास.
मनोकामना सिद्घ करि, परुवहु मेरी आस॥
.. सोरठा ..
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं.
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥.. चौपाई ..
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही. ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही॥
श्री लक्ष्मी चालीसा
तुम समान नहिं कोई उपकारी. सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा . सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
तुम ही हो सब घट घट वासी. विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी. दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी. कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी. सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी. जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता. संकट हरो हमारी माता॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो. चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी. सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा. रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा. लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं. सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी. विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी. कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई. मन इच्छित वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई. पूजहिं विविध भांति मनलाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई. जो यह पाठ करै मन लाई॥
ताको कोई कष्ट नोई. मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि. त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै. ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ कोई न रोग सतावै. पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
पुत्रहीन अरु संपति हीना. अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै. शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा. ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै. कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा. तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही. उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई. लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा. होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी. सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं. तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै. संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी. दर्शन दजै दशा निहारी॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी. तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में. सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण. कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई. ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई॥
॥ दोहा॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास. जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर. मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
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