Mata Parvati Ke Pita Ka Naam : सुबह की आरती में घंटियों की आवाज़ हो या सावन की शिवभक्ति, माता पार्वती का नाम आते ही मन अपने आप श्रद्धा से भर जाता है. लेकिन इसी श्रद्धा के बीच एक सवाल अक्सर अनकहा रह जाता हैमाता पार्वती के पिता कौन थे? यह प्रश्न हमें केवल एक नाम तक नहीं ले जाता, बल्कि भारतीय पुराणों, प्रकृति और मानवीय भावनाओं से बुनी एक गहरी कथा तक पहुंचाता है. माता पार्वती के पिता का नाम राजा हिमवान था, जिन्हें हिमालय का राजा माना जाता है. पुराणों के अनुसार वे प्रकृति, धैर्य और स्थिरता के प्रतीक हैं. उनकी पत्नी माता मैना देवी थीं और कठोर तपस्या के बाद पार्वती का जन्म हुआ. माता पार्वती को देवी सती का पुनर्जन्म माना जाता है. शिव से विवाह के समय राजा हिमवान एक पिता के रूप में दुविधा में पड़ते हैं, लेकिन बेटी की तपस्या और विश्वास को समझकर विवाह स्वीकार करते हैं. यह कथा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, प्रकृति और पारिवारिक संबंधों को समझने का गहरा संदेश देती है.
माता पार्वती: देवी से आगे की पहचान
माता पार्वती को अक्सर शिव की अर्धांगिनी के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनकी पहचान इससे कहीं व्यापक है. वह शक्ति हैं, तपस्या हैं और संतुलन भी. उनकी कथा में जहां कठोर तप है, वहीं बेटी, पत्नी और स्त्री के रूप में एक मानवीय संघर्ष भी दिखाई देता है. यही वजह है कि उनकी कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है.
माता पार्वती के पिता का नाम क्या था?
पुराणों के अनुसार माता पार्वती के पिता का नाम राजा हिमवान, जिन्हें हिमालय का राजा भी कहा जाता है. वह केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि स्वयं हिमालय पर्वत के मानवीय रूप माने गए हैं. यानी माता पार्वती का जन्म किसी साधारण कुल में नहीं, बल्कि उस प्रतीक से हुआ जो स्थिरता, धैर्य और मौन शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है.
राजा हिमवान: प्रकृति और पितृत्व का संगम
राजा हिमवान को पुराणों में शांत, गंभीर और धर्मपरायण बताया गया है. उनके चरित्र में एक पिता की कोमलता और पर्वत जैसी दृढ़ता दोनों का मेल दिखाई देता है. यही गुण माता पार्वती के स्वभाव में भी झलकते हैंअडिग संकल्प, लेकिन भीतर गहरी करुणा.

माता मैना और पार्वती का जन्म
राजा हिमवान की पत्नी थीं माता मैना देवी. कहा जाता है कि दोनों ने कठोर तपस्या के बाद पार्वती को पुत्री रूप में प्राप्त किया. पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती देवी सती का ही पुनर्जन्म थीं, जिन्होंने शिव से पुनः विवाह करने के लिए मानव रूप में जन्म लिया.
एक पिता की दुविधा
लोककथाओं में एक रोचक प्रसंग आता हैजब माता पार्वती भगवान शिव से विवाह का प्रण लेती हैं. शिव का वैराग्य, उनका औघड़ स्वरूप, यह सब एक पिता के लिए चिंता का कारण बनता है. राजा हिमवान भी विचलित होते हैं. लेकिन बेटी की तपस्या, उसका अटूट विश्वास और शिव के प्रति समर्पण अंततः उन्हें इस विवाह के लिए सहमत कर देता है. यह प्रसंग आज भी माता-पिता और संतानों के रिश्ते को समझने की एक सुंदर मिसाल है.
हिमालय केवल पर्वत नहीं, एक भाव है
आज जब हम हिमालय को देखते हैं, तो उसे सिर्फ एक भौगोलिक संरचना समझ लेते हैं. लेकिन पुराणों में हिमालय एक जीवंत सत्ता हैएक पिता, एक संरक्षक. शायद यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को मां और पिता दोनों का दर्जा मिला है.
आज के समय में इस कथा का अर्थ
तेज़ रफ्तार आधुनिक जीवन में ऐसी कथाएं हमें ठहरने का मौका देती हैं. माता पार्वती और राजा हिमवान का संबंध हमें सिखाता है कि विश्वास, धैर्य और प्रकृति के साथ संतुलन कितना आवश्यक है. यह कथा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन भी है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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