होली का त्योहार केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह सत्य की विजय, भक्ति, प्रेम और परिवर्तन का संदेश देता है. इसकी शुरुआत वेद‑पुराणों में वर्णित कई कथाओं से जुड़ी मानी जाती है. इनमें सबसे प्रमुख प्रह्लाद–होलिका की कथा है, जिसे इस त्योहार की आधारशिला माना जाता है.
1. होलिका दहन की कथा — सत्य की विजय का प्रतीक
शास्त्रों के अनुसार, दानव राजा हिरण्यकश्यपु स्वयं को भगवान मानता था और चाहता था कि पूरे राज्य में उसकी ही पूजा हो. लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवद्भक्त था और भगवान विष्णु की आराधना करता था. हिरण्यकश्यपु ने कई बार प्रह्लाद को मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह भगवान की कृपा से बच गया.
अंत में, उसने अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का आदेश दिया. होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती. वह प्रह्लाद को गोद में लेकर धधकती आग में बैठ गई.
लेकिन सत्य और भक्ति का साथ था, प्रह्लाद सुरक्षित बच गया और होलिका भस्म हो गई.
यही घटना होलिका दहन के रूप में मनाई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.
2. रंगों वाली होली की शुरुआत — कृष्ण और राधा की कथा
शास्त्रों में दूसरी महत्वपूर्ण कथा भगवान कृष्ण और राधारानी से जुड़ी है.
कृष्ण बचपन में सांवले थे और राधा गोरी, इसलिए कृष्ण को कभी‑कभी यह बात खटकती थी.
यशोदा माँ ने उन्हें हंसते हुए सलाह दी कि राधा के चेहरे पर रंग लगा दो, तभी से रंग लगाने की परंपरा चल पड़ी.
कृष्ण अपने मित्रों के साथ बरसाने और वृंदावन में खेल‑खेल में रंग उड़ाते थे.
इसी परंपरा को आज फाग, लट्ठमार होली और रंगों वाली होली के रूप में मनाया जाता है.
3. अन्य पौराणिक मान्यताएं
कुछ ग्रंथों में होली को कामदेव के पुनर्जीवन से भी जोड़ा गया है.
शिवजी के तप भंग करने पर कामदेव भस्म हो गए थे, लेकिन उनकी पत्नी रति के दुख से पिघलकर शिव ने उन्हें पुनर्जीवन दिया.
इस खुशी में होली जैसे उत्सव मनाने का वर्णन मिलता है.
होली को ऋतु परिवर्तन का त्योहार भी माना गया है, जो बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है.
शास्त्रों के अनुसार होली की शुरुआत तीन प्रमुख पक्षों से जुड़ी है.
प्रह्लाद और होलिका की कथा, जो बुराई पर अच्छाई की विजय सिखाती है.
कृष्ण–राधा की रंग लीला, जिससे रंग खेलने की रसपूर्ण परंपरा निकली.
कामदेव की कथा, जो प्रेम और पुनर्जीवन का प्रतीक है.
