Home Food कौन सा अकेला फल, जिसे हम रोज खाते हैं, नहीं होते उसमें...

कौन सा अकेला फल, जिसे हम रोज खाते हैं, नहीं होते उसमें एक भी बीज, तो कैसे लगता पेड़

0
0


आमतौर पर हम जितने भी फ्रूट्स खाते हैं, उन सभी के अंदर खाते समय अंदर बीज निकलते हैं. इन्हीं बीजों से इन फ्रूट्स के पौधे या पेड़ फिर लगाए जाते हैं. ये प्रकृति की एक स्वाभाविक सी बात है. लेकिन एक फल ऐसा भी है, जो बहुत ही लोकप्रिय है. दुनियाभर में खाया जाता है. भारत में इसको खूब खाते और उगाते हैं लेकिन इसमें एक भी बीज नहीं होता. इस हिसाब ये फ्रूट्स नेचर के नियमों से अलग जाता है. इसका पेड़ फिर कैसे लगता होगा, क्या इस पर आप दिमागी घोड़े दौड़े सकते हैं.

क्या आपको मालूम है कि वो कौन सा फल है जिसमें बिल्कुल बीज नहीं मिलते. हां एक जमाना जरूर था जब इस फल में भी बड़े बड़े बीज होते थे लेकिन फिर गायब होते चले गए. हो सकता है कि इसकी किसी प्रजाति में बीज होते हों लेकिन ऐसा लगता तो नहीं. इसे सबसे ज्यादा उगाता भारत है तो सबसे ज्यादा खाता ऊगांडा है और दुनियाभर में सबसे ज्यादा निर्यात इक्वाडोर करता है.

तो शायद आपने अंदाज लगा लिया होगा कि ये फल कौन सा है. चलिए हम ही बता देते हैं. ये फल है केला. भारत में सबसे ज्यादा खाया जाने वाला फल. केले में आज बीज नहीं होते, लेकिन पहले होते थे. इंसान की पसंद और वैज्ञानिक तरीकों ने उन्हें “खत्म” करवा दिया.

पहले कैसे होते थे ये फल

हज़ारों साल पहले के जंगली केले छोटे, कड़क और काले कठोर बीजों से भरे पड़े थे. उन्हें खाना मुश्किल था. ये बीज इतने सख्त होते थे कि दांत टूट सकते थे.

फिर बीज कैसे “खत्म” हुए?

यहां विज्ञान और इतिहास की कहानी आती है. कुदरती तौर पर कुछ केले के पौधों में “त्रुटि” यानि म्यूटेशन जैसी स्थिति बन गई. इससे वे बिना बीज के ही फल देने लगे. ये फल नर्म और खाने लायक थे.

प्राचीन किसानों ने देखा कि इन बीजरहित केलों का स्वाद बेहतर है और खाने में आसान है. उन्होंने ऐसे पौधों को बचा कर रखा और आगे बढ़ाया. चूंकि इन नए पौधों में बीज नहीं थे, किसानों ने उनकी जड़ के पास से निकलने वाले नन्हें पौधे को अलग करके नए पौधे लगाए. यह ठीक वैसे ही है जैसे तुलसी या पुदीने की डाली काटकर लगाते हैं.

इस तरह सैकड़ों सालों तक सिर्फ बीज रहित और स्वादिष्ट केलों को ही चुन-चुनकर उगाया गया. धीरे-धीरे बीज वाले जंगली केले खेती से गायब हो गए. बीज रहित केले ही बाज़ार में रह गए.

विज्ञान की नज़र से

विज्ञान कहता है कि हमारे खाए जाने वाले केलों में एक “आनुवंशिक दोष” है. इससे वो संतान पैदा करने में असमर्थ हैं. वैज्ञानिक भाषा में इसे स्त्री-बंध्यता यानि Sterility कहते हैं.

आज दुनियाभर में लगभग सभी केले के पौधे आनुवंशिक रूप से एक-दूसरे के हूबहू क्लोन हैं. यानी, हर केला एक ही पुरखे के पौधे की “कॉपी” है. इसका फायदा ये है कि हमें हमेशा एक जैसा, मीठा, नर्म और बीज रहित फल मिलता है. अगर कोई नया रोग या कीड़ा आ जाए, तो सारे एक जैसे पौधे उसकी चपेट में आ सकते हैं, क्योंकि उनमें रोग से लड़ने की विविधता नहीं है.

कहां सबसे ज्यादा कहां पैदा होता है

दुनियाभर में केले का सालाना उत्पादन करीब 12 करोड़ टन (2022 का आंकड़ा). इसकी सालाना खपत भी इतनी ही है. रोज तकरीबन 27 से 30 लाख टन. दुनियाभर में हर दिन लगभग 10 से 11 अरब केले खाए जाते हैं. एक औसत केले का वजन लगभग 120 ग्राम होता है.

केले का सबसे ज्यादा उत्पादन भारत में होता है. ये करीब 3.2 करोड़ टन है दुनिया का 26 फीसदी. इसके बाद चीन (1.2 करोड़ टन), इंडोनेशिया और ब्राजील का नंबर आता है. भारत बेशक सबसे ज्यादा केले पैदा करता है लेकिन इसका निर्यात ज्यादा नहीं कर पाता, क्योंकि देश में इसकी खपत बहुत ज्यादा है. सबसे ज्यादा करीब 70 लाख टन केलों का निर्यात इक्वाडोर करता है यानि दुनिया का 30 फीसदी. ये यूरोप और अमेरिका को भेजे जाते हैं.

किस देश में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति खपत

विश्व में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति केले की खपत ऊगांडा में है. हर व्यक्ति आंकड़ों के अनुसार सालभर में 220-250 किलोग्राम केला खा जाता है जबकि भारत में ये खपत प्रति व्यक्ति करीब 20-25 किलोग्राम है. उगांडा और पूर्वी अफ्रीका में पक्के हुए केले को उबालकर या मसलकर एक मुख्य भोजन के रूप में खाया जाता है, जैसे हम चावल या रोटी खाते हैं.

मूड बूस्टर और नेचुरल एनर्जी देने वाला

एथलीट केले को “प्रकृति का एनर्जी बार” मानते हैं. शोध बताते हैं कि दो केले 90 मिनट की कसरत के लिए पर्याप्त ऊर्जा दे सकते हैं. इसमें मौजूद प्राकृतिक शर्करा (फ्रुक्टोज़, ग्लूकोज़, सुक्रोज़), पोटेशियम और विटामिन B6 तुरंत ऊर्जा देते हैं.

एक मध्यम आकार का केला लगभग 422 मिलीग्राम पोटेशियम देता है, जो रक्तचाप को नियंत्रित रखने, हृदय रोग के जोखिम को कम करने और मांसपेशियों की ऐंठन रोकने में मदद करता है.

केले में ट्रिप्टोफैन नामक अमीनो अम्ल होता है, जो शरीर में सेरोटोनिन यानि फील-गुड हार्मोन) बनाने में मदद करता है. इसका विटामिन B6 इसे तेज़ करता है, प्राकृतिक रूप से मूड सुधारने में सहायक है.

इससे बनाए जा रहे कपड़े

– केले के पौधे के तने से निकलने वाले मजबूत प्राकृतिक रेशों का उपयोग टिकाऊ कपड़े, बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग और यहां तक कि कारों के इंटीरियर पार्ट्स बनाने के लिए किया जा रहा है.
– केले के छिलके की बायोप्लास्टिक बनाई जाती है, जिससे सस्टेनेबल पैकेजिंग और यहां तक कि शिंकानसेन बुलेट ट्रेन के कुछ हिस्से बनाए जाते हैं.
– केले में प्राकृतिक रूप से पोटैशियम-40 नामक एक रेडियोधर्मी आइसोटोप पाया जाता है. चिंता न करें! इतनी मात्रा पूरी तरह हानिरहित है. वैज्ञानिक “बनाना इक्विवेलेंट डोज” नामक एक हल्के-फुल्के माप का इस्तेमाल करते हैं ताकि आम लोगों को विकिरण के स्तर को समझाया जा सके.


.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.

https://hindi.news18.com/news/knowledge/which-single-fruit-that-we-eat-every-day-does-not-have-any-seeds-how-the-tree-grow-then-ws-ekl-9997194.html

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version