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नीला रंग बताएगा डायबिटीज का हाल! वडोदरा के रिसर्चर्स ने तांबे से विकसित की नई ग्लूकोज डिटेक्शन तकनीक

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वडोदरा स्थित एम.एस. यूनिवर्सिटी के केमिस्ट्री विभाग के शोधकर्ताओं ने ऐसा इको-फ्रेंडली पाउडर विकसित किया है, जो रीसायकल किए गए तांबे से बनाया गया है और तुरंत खून या पसीने में ग्लूकोज का स्तर पता कर सकता है. यह पाउडर रंग बदलकर रिलल्‍ट देता है, जैसे हल्का नीला रंग हुआ तो कम ग्लूकोज है और गहरा नीला रंग अधिक ग्लूकोज दर्शाता है. यह एक सरल, किफायती और टिकाऊ विकल्प है, जो पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक ग्लूकोमीटर की तुलना में विशेष रूप से ग्रामीण और कम संसाधन वाले क्षेत्रों में डायबिटीज मॉनिटरिंग को आसान बना सकता है.

टीओआई के मुताबिक, इस शोध का नेतृत्व प्रोफेसर सोनल ठाकोर ने अपनी पीएचडी छात्राओं श्रद्धांजलि सामल और सोनल ठाकोर के साथ किया. टीम ने पुरानी इलेक्ट्रिकल कॉपर वायर को ग्लूकोज-सेंसिंग मटीरियल में बदलने का तरीका विकसित किया. शोध के नतीजे इस साल जुलाई में इंटरनेशनल केमिकल इंजीनियरिंग जर्नल में प्रकाशित हुए.

अब बिना महंगे इलेक्ट्रॉनिक ग्लूकोमीटर के भी डायबिटीज मॉनिटरिंग आसान हो जाएगी.

प्रोफेसर ठाकोर के अनुसार, टीम ने स्क्रैप कॉपर वायर से कॉपर निकालकर उसे कॉपर नैनोपार्टिकल्स में परिवर्तित किया. इन नैनोपार्टिकल्स को किटोसान नामक प्राकृतिक पॉलिमर की मदद से स्थिर किया गया और प्लांट-बेस्ड कॉम्पाउंड के साथ मजबूती दी गई, जो नवीनीकरणीय कॉर्न स्टार्च से प्राप्त होता है. “अंतिम मटीरियल प्राकृतिक एंज़ाइम की तरह व्यवहार करता है और इसे नैनोज़ाइम कहा जाता है,” उन्होंने बताया.

कॉपर नैनोज़ाइम पाउडर फॉर्म में उपलब्ध है और ग्लूकोज का पता रंग आधारित सरल तरीके से करता है. “जब ग्लूकोज मौजूद होता है, तो यह हाइड्रोजन पेरोक्साइड बनाता है, जो नैनोज़ाइम की मौजूदगी में रंगहीन घोल को गहरा नीला कर देता है. रंग की तीव्रता सीधे ग्लूकोज की मात्रा से संबंधित होती है,” ठाकोर ने समझाया.

इस प्रणाली का परीक्षण वास्तविक रक्त सीरम के नमूनों पर किया गया, जिसमें डायबिटिक और नॉन-डायबिटिक व्यक्तियों के डेटा की तुलना मानक ग्लूकोमीटर से की गई. परिणाम समान पाए गए. टीम अब अगले चरण में मानव पसीने के माध्यम से ग्लूकोज स्तर का पता लगाने पर काम कर रही है.“हम रंग कोड्स को संख्यात्मक मान में बदलने के तरीकों का भी अध्ययन कर रहे हैं, ताकि उपयोगकर्ता अपने ब्लड ग्लूकोज स्तर को सटीक रूप से जान सकें,” ठाकोर ने बताया.

शोध को पूरा करने में लगभग एक साल का समय लगा. ठाकोर के अनुसार, इस पाउडर को आसानी से पेपर-आधारित स्ट्रिप्स या डिप टेस्ट में इस्तेमाल किया जा सकता है. “यदि इसे बड़े पैमाने पर तैयार किया जाए, तो यह डायबिटीज परीक्षण को सस्ता, इकोफ्रेंडली और ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध हो सकता है. खासतौर पर उन जगहों पर  जहां इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और टेस्ट स्ट्रिप्स हमेशा मौजूद नहीं होते,” उन्होंने कहा.

यह शोध कम लागत वाला कॉपर पाउडर से बनता है जो तुरंत डायबिटीज का पता लगाने वाले विषय पर केंद्रित है और इसे इंटरनेशनल केमिकल इंजीनियरिंग जर्नल में जुलाई में प्रकाशित किया गया.

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