Student’s Suicide NCRB Data: जो उम्र सपने देखने, पढ़-लिखकर नई ऊंचाइयां छूने की होती है, उस उम्र में छात्र मौत को गले लगा रहे हैं. यह खुलासा हाल ही में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की ओर से जारी किए गए आंकड़ों में हुआ है. एनसीआरबी का यह डाटा काफी डराने वाला है जो बता रहा है कि पिछले 10 साल में छात्रों में सुसाइड करने की घटनाएं 64.9 फीसदी तक बढ़ गई हैं. साल 2023 में 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की है.
पढ़ाई या रिलेशनशिप? क्या हैं कारण?
डॉ. ओमप्रकाश ने बताया कि छात्रों के ऊपर शैक्षणिक दबाव सबसे बड़ा फैक्टर है. जिसमें नीट या जेईई (NEET/JEE) जैसी परीक्षाओं में तीव्र प्रतिस्पर्धा, असफलता का डर, माता-पिता की अपेक्षाएं, और कोचिंग सेंटर्स (जैसे कोटा) में टॉक्सिक कॉम्पिटिटिवनेस आदि के भंवर जाल में फंसकर बच्चे मौत को चुन रहे हैं. एनसीआरबी 2022 के डेटा के अनुसार भी परीक्षा में असफलता ही मानसिक तनाव और फिर सुसाइड जैसे कदमों का मुख्य कारण है.
इसके अलावा पारिवारिक और व्यक्तिगत मुद्दे भी छात्रों को मौत की ओर धकेल रहे हैं. इनमें आपसी संबंधों में विवाद, रोमांटिक रिलेशनशिप में समस्याएं, दूरी या अलगाव, दुर्व्यवहार की वजह से 23.7% मामले देखे गए हैं. जबकि आत्मसम्मान को ठेस पहुंचने, मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न और नशीले पदार्थों के सेवन की वजह से 2022 में सुसाइड का ग्राफ 6.8% बढ़ा है.
इसके अलावा कुछ मानसिक स्वास्थ्य कारक भी हैं जो खुदकुशी का कारण बने हैं. इनमें अवसाद 6.7% मामलों में जबकि क्रोध, सोशल मीडिया का प्रभाव और शिक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार जैसे सिस्टम से जुड़े मुद्दे भी इसमें शामिल हैं.
डॉ. ओमप्रकाश कहते हैं कि कई केसेज में जातिगत टिप्पणियां, मेडिकल कॉलेजों में सीनियर्स से दबाव, और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की वजह से भी घटनाएं हुई हैं.
छात्रों को नहीं मिल पाती मदद
डॉ. ओमप्रकाश कहते हैं कि सुसाइड तक पहुंचने से पहले छात्र मानसिक रूप से उस तक पहुंचते हैं, जबकि भारत में मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी या पागलपन के रूप में देखा जाता है. साथ ही ऐसे बच्चों तक पेशेवर मदद नहीं पहुंच पाती. इसके अलावा स्कूल और कॉलेजों में काउंसलरों की भारी कमी है, खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तक जागरुकता की कमी होती है. मनोवैज्ञानिकों की सुविधाएं भी संपन्न लोगों तक ही हैं. कई ऐसी चीजें भी हैं जो सामाजिक रूप से भेदभाव की वजह से भी पैदा होती हैं.
कैसे रोकी जा सकती हैं ये घटनांए
मनोचिकित्सक कहते हैं कि सरकार की पहल जैसे निशुल्क हेल्पलाइन टेलीमानस काफी असरदार है. अगस्त 2025 तक इस हेल्पलाइन ने 2.38 मिलियन कॉल्स संभाले हैं और कई सुसाइड के स्तर तक पहुंच चुके युवाओं को बचाया है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रीय टास्क फोर्स इस समस्या को हल करने की कोशिश कर रहा है. हालांकि जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की जरूरत है.
छात्र हों, किसान या गृहिणी हों, कोई भी व्यक्ति सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर 14416 पर कॉल कर मदद ले सकते हैं. अगर किसी में आपको तनाव या अवसाद के लक्षण दिखाई देते हैं, तो उसको मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक तक पहुंचाने में मदद करें, ये पारिवारिक के साथ ही सामाजिक जिम्मेदारी भी है. ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके.
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