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ancer disrupts body clock circadian rhythm । कैंसर का दिमाग की घड़ी और इम्यून सिस्टम पर असर नई रिसर्च

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Cancer Research New Discovery: हमारा शरीर सिर्फ सांस लेने या खाना पचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक अंदरूनी घड़ी के हिसाब से चलता है. दिन में कब एक्टिव रहना है और रात में कब आराम करना है, यह सब दिमाग अपने आप कंट्रोल करता है. इसी सिस्टम को सर्कैडियन रिदम कहा जाता है. लेकिन अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि कैंसर इस नेचुरल सिस्टम को भी धीरे धीरे बिगाड़ देता है. यही वजह है कि कई कैंसर मरीजों को लगातार थकान, नींद की समस्या और कमजोरी महसूस होती है. हाल ही में हुई एक नई स्टडी में सामने आया है कि कैंसर दिमाग के उस हिस्से को प्रभावित करता है जो शरीर के स्ट्रेस हार्मोन और इम्यून सिस्टम को कंट्रोल करता है. यह खोज इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि इससे कैंसर के इलाज के तरीके और बेहतर बनाए जा सकते हैं.

कैंसर और स्ट्रेस हार्मोन का कनेक्शन
वैज्ञानिकों ने चूहों पर किए गए एक्सपेरिमेंट में पाया कि ब्रेस्ट कैंसर शरीर में एक खास हार्मोन के उतार चढ़ाव को प्रभावित करता है. इस हार्मोन का नाम है कॉर्टिकोस्टेरोन, जो चूहों में मुख्य स्ट्रेस हार्मोन होता है. आम तौर पर इसका लेवल दिन और रात के हिसाब से बदलता रहता है. सुबह इसका लेवल अलग होता है और रात में अलग. यही बदलाव शरीर को बैलेंस में रखता है.

लेकिन जब चूहों के शरीर में ब्रेस्ट कैंसर सेल्स डाली गईं, तो कुछ ही दिनों में यह नेचुरल रिदम कमजोर होने लगी. हैरानी की बात यह थी कि ट्यूमर दिखाई देने से पहले ही हार्मोन का पैटर्न लगभग 40 से 50 फीसदी तक फ्लैट हो गया. यानी सुबह और रात के हार्मोन लेवल में फर्क ही नहीं बचा.

इंसानों में भी दिखता है यही असर
स्टडी में बताया गया कि यही असर इंसानों में भी देखा गया है. जिन कैंसर मरीजों में स्ट्रेस हार्मोन का दिन रात वाला फर्क खत्म हो जाता है, उनमें थकान ज्यादा होती है. ऐसे मरीजों का इम्यून सिस्टम भी कमजोर हो जाता है. शरीर की नेचुरल किलर सेल्स जो कैंसर सेल्स से लड़ती हैं, उनकी एक्टिविटी कम हो जाती है. इसके साथ ही टी सेल्स का काम भी सही तरीके से नहीं हो पाता.

रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों का हार्मोन रिदम पूरी तरह फ्लैट हो जाता है, उनमें ब्रेस्ट, लंग, कोलोरेक्टल और ओवेरियन कैंसर ज्यादा तेजी से बढ़ता है और उनकी लाइफ क्वालिटी भी खराब होती है.

दिमाग का कौन सा हिस्सा करता है गड़बड़
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया में दिमाग का एक अहम हिस्सा शामिल है जिसे हाइपोथैलेमस कहा जाता है. यही हिस्सा स्ट्रेस हार्मोन को कंट्रोल करने वाले सिस्टम का हिस्सा होता है. कैंसर की मौजूदगी में हाइपोथैलेमस के कुछ न्यूरॉन्स जरूरत से ज्यादा एक्टिव हो जाते हैं. इस वजह से हार्मोन का नेचुरल रिलीज पैटर्न बिगड़ जाता है और शरीर का बैलेंस खराब होने लगता है.

सही समय पर स्टिमुलेशन से मिला फायदा
इस रिसर्च का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि वैज्ञानिकों ने इन न्यूरॉन्स को सही समय पर स्टिमुलेट किया. जब चूहों के दिन से रात में जाने के समय इन न्यूरॉन्स को एक्टिव किया गया, तो स्ट्रेस हार्मोन का नेचुरल रिदम दोबारा शुरू हो गया. इसका सीधा असर इम्यून सिस्टम पर पड़ा. कैंसर से लड़ने वाली सेल्स ज्यादा एक्टिव हो गईं और ट्यूमर की ग्रोथ भी कम हो गई.

खास बात यह रही कि यह असर बिना किसी एंटी कैंसर दवा के देखा गया. यानी सिर्फ शरीर की नेचुरल घड़ी को सही करने से ही कैंसर पर असर पड़ा.

गलत समय पर क्यों नहीं करता काम
वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि अगर यही स्टिमुलेशन गलत समय पर किया जाए, तो कोई फायदा नहीं होता. इसका मतलब साफ है कि शरीर के लिए सिर्फ क्या किया जा रहा है यह जरूरी नहीं, बल्कि कब किया जा रहा है यह भी उतना ही अहम है. सही समय पर हार्मोन रिदम का होना ही इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है.

भविष्य में इलाज का नया रास्ता
रिसर्चर्स का मानना है कि भविष्य में इस खोज की मदद से कैंसर ट्रीटमेंट को और असरदार बनाया जा सकता है. अगर शरीर की दिन रात की घड़ी को सही रखा जाए, तो मौजूदा इलाज ज्यादा अच्छे से काम कर सकते हैं और साइड इफेक्ट्स भी कम हो सकते हैं. यह तरीका खास तौर पर उन मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकता है जो इलाज के दौरान ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस करते हैं.

क्यों है यह खोज खास
यह स्टडी इस बात को साफ करती है कि कैंसर सिर्फ एक ट्यूमर की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर के सिस्टम को प्रभावित करता है. दिमाग, हार्मोन और इम्यून सिस्टम तीनों आपस में जुड़े हुए हैं. अगर इनका बैलेंस बिगड़ता है, तो बीमारी और ज्यादा गंभीर हो सकती है. वैज्ञानिकों की यह खोज आने वाले समय में कैंसर के इलाज को एक नया नजरिया दे सकती है, जहां दवाओं के साथ साथ शरीर की नेचुरल रिदम को भी ठीक रखने पर जोर दिया जाएगा.

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