Ayurvedic Timings for Medicines: आयुर्वेद में अधिकतर बीमारियों की असरदार दवाएं उपलब्ध हैं. अगर सही तरीके से आयुर्वेदिक दवाओं का सेवन किया जाए, तो बीमारियों से राहत मिल सकती है. आयुर्वेद में हर चीज का एक सही वक्त बताया गया है, ताकि शरीर की प्रकृति के अनुसार दवाएं ली जा सकें. अधिकतर लोग दवा लेते समय सिर्फ उसकी डोज पर ध्यान देते हैं, लेकिन आयुर्वेद बताता है कि दवा का असर उसके समय यानी काल पर निर्भर करता है. सही समय पर ली गई दवा बीमारी को सही तरीके से कंट्रोल कर देती है, क्योंकि उस समय शरीर दवा को सबसे अच्छे तरीके से अवशोषित करता है. चरक संहिता में कहा गया है कि कालो हि भेषजं यानी समय ही दवा का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है. इसलिए आयुर्वेद दवाओं की टाइमिंग को शरीर की प्रकृति, पाचन अग्नि और दोषों के उतार-चढ़ाव के अनुसार निर्धारित करता है.
सुबह खाली पेट दवा लेना
आयुर्वेद के अनुसार सुबह खाली पेट शरीर की अवशोषण क्षमता सबसे अधिक होती है. इस समय ली गई दवा तेजी से ब्लड में घुलकर सीधे असर दिखाती है. यह समय कमजोरी दूर करने वाली दवाओं, ब्रेन से संबंधित दवाओं और ऑटोइम्यून बीमारियों की दवाओं के लिए सबसे अच्छा माना गया है. खाली पेट शरीर में कोई अवरोध नहीं होता, जिससे दवा का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. यही कारण है कि कई टॉनिक, कैप्सूल और जड़ी-बूटियां सुबह लेने की सलाह दी जाती है.
दोपहर के खाने से पहले
दिन में भोजन से पहले शरीर में कफ की प्रवृत्ति सक्रिय रहती है. यह समय कफ को कम करने वाली दवाओं के उपयोग के लिए सबसे अच्छा होता है. जिन व्यक्तियों को भूख न लगना, भारीपन, पाचन की कमजोरी या कफ-संबंधी समस्याएं होती हैं, उन्हें लंच से पहले दवा लेने की सलाह दी जाती है. इस समय ली गई दवा पाचन अग्नि को बढ़ाती है, भूख सुधारती है और कफ दोष को नियंत्रित करने में सहायता करती है. पाचन तंत्र को सक्रिय करने वाली जड़ी-बूटियां और चूर्ण इसी समय कारगर होते हैं.
डिनर के साथ दवा लेना
यह वह समय है जब खाने के साथ ली गई औषधियां शरीर को सीधा पोषण प्रदान करती हैं. भोजन के साथ दवा लेने से उसका अवशोषण संतुलित तरीके से होता है और दवा खून में धीरे-धीरे शामिल होती है. आयुर्वेद में अश्वगंधा, शतावरी, घृत आधारित औषधियां और शक्तिवर्धक दवाएं इसी समय लेने की सलाह दी जाती हैं. यह समय तंदुरुस्ती बढ़ाने, शरीर की ऊर्जा को संतुलित करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है.
रात के खाने के बाद
डिनर के बाद शरीर में पित्त दोष बढ़ने की संभावना रहती है. यही कारण है कि गैस, सीने में जलन, अल्सर, पेट की गर्मी और पित्त संबंधी रोगों के लिए दवाएं इसी समय दी जाती हैं. इस अवधि में ली गई दवा शरीर की गर्मी को संतुलित करती है, पाचन नली को शांत करती है और रात भर धीरे-धीरे असर करती है. जो लोग पित्त की समस्याओं से परेशान रहते हैं, उनके लिए यह समय अत्यंत लाभकारी माना जाता है.
रात को सोने से पहले
आयुर्वेद रात को सोने से पहले के समय को मरम्मत काल कहता है, क्योंकि इस समय शरीर खुद की मरम्मत और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में प्रवेश करता है. इस समय ली गई दवा सीधे नसों और ऊतकों पर प्रभाव डालती है. कब्ज, त्वचा रोग, अनिद्रा, तंत्रिका तंत्र की कमजोरी और मानसिक तनाव से जुड़ी दवाएं इसी समय सबसे ज्यादा असर करती हैं. रात का शांत वातावरण दवा के प्रभाव को और भी गहरा बनाता है, जिससे उपचार तेजी से आगे बढ़ता है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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