मुलायम स्वाद और सफेद चमक की वजह से मैदा हमारी थाली का ऐसा हिस्सा बन गया है, जिसे छोड़ना ज्यादातर लोगों को मुश्किल लगता है. चाहे बिस्किट हों, समोसे, भटूरे या पिज्जा, लगभग हर फेवरेट चीज में मैदा ही इस्तेमाल होता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही सफेद आटा धीरे-धीरे पाचन तंत्र के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. आयुर्वेद और न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स इसे एक तरह का साइलेंट खतरा मानते हैं, क्योंकि इसका असर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन लंबे समय में गंभीर हो सकता है.
असल में, गेहूं को प्रोसेस करके जब मैदा बनाया जाता है, तो उसकी भूसी और अंकुर वाला हिस्सा हटा दिया जाता है. यही हिस्से फाइबर, विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होते हैं. इनके निकल जाने के बाद जो बचता है, वह केवल स्टार्च होता है, जिसे आयुर्वेद में पोषण रहित भोजन यानी निसत्व आहार कहा गया है. फाइबर की कमी की वजह से मैदा आंतों में भारीपन पैदा करता है और पाचन प्रक्रिया को सुस्त बना देता है.
मैदा जब पानी के संपर्क में आता है, तो उसमें चिपचिपापन आ जाता है. यही चिपचिपी परत आंतों में जमने लगती है, जिससे भोजन आगे बढ़ने में परेशानी होती है. छोटी आंत में मौजूद विली, जो शरीर को पोषक तत्व पहुंचाने का काम करते हैं, इस परत के कारण ठीक से काम नहीं कर पाते. नतीजा यह होता है कि शरीर न सिर्फ मैदे से, बल्कि उसके साथ खाए गए दूसरे पोषक तत्वों से भी पूरा फायदा नहीं उठा पाता.
मैदा को ज्यादा सफेद और आकर्षक दिखाने के लिए अक्सर केमिकल ब्लीचिंग की जाती है. इस प्रक्रिया में बनने वाला एलोक्सन नामक तत्व सेहत के लिए हानिकारक माना जाता है. बिना जाने हम रोज ऐसे रसायनों का सेवन कर रहे होते हैं. इसके अलावा मैदा एसिडिक प्रकृति का होता है. ज्यादा मात्रा में इसका सेवन करने पर शरीर का एसिड संतुलन बिगड़ सकता है और कैल्शियम की भरपाई के लिए शरीर हड्डियों से इसे खींचने लगता है, जिससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं.
मैदे का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी ज्यादा होता है. इसका मतलब यह है कि इसे खाने के बाद ब्लड शुगर तेजी से बढ़ती है. बार-बार ऐसा होने से वजन बढ़ने, इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
हालांकि इसका यह मतलब नहीं कि मैदा पूरी तरह बंद कर दिया जाए. आयुर्वेद कुछ आसान उपाय सुझाता है, जिनसे इसके दुष्प्रभाव कम किए जा सकते हैं. मैदा खाने के बाद गुनगुना पानी पीना और त्रिफला का सेवन करना पाचन को सपोर्ट करता है. वहीं अजवाइन और काला नमक गैस और अपच से राहत दिलाने में मदद कर सकते हैं.
साथ ही रोज की डाइट में मैदे की जगह मल्टीग्रेन आटा, जौ, रागी या बाजरा जैसे विकल्पों को अपनाना बेहतर होता है. ये न सिर्फ पचने में आसान होते हैं, बल्कि शरीर को जरूरी फाइबर और पोषण भी देते हैं. थोड़े-से बदलाव से आप अपनी सेहत को बड़े नुकसान से बचा सकते हैं.
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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/health-safed-aata-maida-silent-khatra-aant-nuksan-ws-ekl-10113143.html
