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अब एक दिन में होंगे सोमनाथ और द्वारकाधीश के दर्शन, ज्‍यादा रुकने की नहीं होगी जरूरत, जानें रेलवे का प्‍लान

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Indian Railways Doubling rail line- पश्चिमी रेलवे के मुख्‍य जनसंपर्क अधिकारी विनीत अभिषेक ने बताया कि इन तीर्थ स्‍थानों के साथ हर साल लाखों श्रद्धालु बेट द्वारका, नगेश्वर ज्योतिर्लिंग और रुक्मिणी मंदिर के दर्शन को आते हैं. रेल लाइन के डबलिंग से इन सभी श्रद्धालुओं को राहत मिलेगी.

अब एक दिन में होंगे सोमनाथ और द्वारकाधीश के दर्शन, रुकने की नहीं होगी जरूरतरेल लाइन डबलिंग सफर करेगी आसान.

नई दिल्‍ली. चारधाम में एक द्वारकाधीश के दर्शन के साथ-साथ सोमनाथ के दर्शन भी किए जा सकेंगे. भारतीय रेलवे ने सौराष्‍ट्र के कई धार्मिक स्‍थलों के लिए खास प्‍लान बनाया है, इसी के तहत द्वारका तक के लिए रेल लाइन को डबल किया जा रहा है. इससे द्वारका और आसपास के कई धार्मिक स्‍थलों के दर्शन आसानी से और कम समय में हो जाएगा. इस प्रोजेक्‍ट को कैबिनेट ने अप्रूवल दे दी है और जल्‍द ही काम शुरू हो जाएगा.

देवभूमि द्वारका (ओखा) कनालुस रेल सेक्‍शन की 159 किलोमीटर लंबी सिंगल लाइन को डबल करने का प्रोजेक्ट मंजूरी मिल गयी है. इसकी कुल लागत 1,457 करोड़ रुपये आएगी. यह लाइन जामनगर और देवभूमि द्वारका जिलों से गुजरती है और भगवान कृष्ण की नगरी द्वारका जाने का सबसे अहम रेल मार्ग है. द्वारका की आध्यात्मिक महत्ता और जरूरतद्वार का चार धामों में से एक और सप्तपुरी में शामिल है.

पश्चिमी रेलवे के मुख्‍य जनसंपर्क अधिकारी विनीत अभिषेक ने बताया कि इन तीर्थ स्‍थानों के साथ हर साल लाखों श्रद्धालु बेट द्वारका, नगेश्वर ज्योतिर्लिंग और रुक्मिणी मंदिर के दर्शन को आते हैं. इस तरह इन तीर्थ स्‍थानों को जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्‍या काफी बढ़ जाती है. अभी यहां पर सिंगल लाइन की वजह से ट्रेनों को समय लगता है. एक ट्रेन को पास कराने के लिए दूसरी को किसी स्‍टेशन में रुकना पड़ता है.
पोर्ट से भी होगी कनेक्‍टीविटी

यह लाइन आर्थिक रूप से भी इलाके को मजबूती प्रदान करने वाली होगी. क्‍योंकि ओखा पोर्ट और सलाया पोर्ट को भी सीधे भी जोड़ती है. जिससे खाद्य नमक (एडिबल साल्ट), सीमेंट, उर्वरक ढोया जाता है. ट्रैक के डबलिंग के बाद हर साल अतिरिक्त 11 मिलियन टन अतिरिक्‍त माल की ढुलाई हो सकेगी.

पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद

डबल रेल लाइन पर्यावरण के लिए बेहतर होगी. हर साल 2.8 करोड़ लीटर डीजल की बचत होगी. कार्बन उत्सर्जन में 14 करोड़ किलोग्राम की कमी आएगी, जो हर साल करीब 56 लाख पेड़ लगाने के बराबर होगा. साथ ही लॉजिस्टिक्स लागत में सालाना 311 करोड़ रुपये की बचत होगी. काम शुरू होने के बाद 3 से 4 साल में पूरा होने का लक्ष्य है.

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