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बांके बिहारी मंदिर में 108 दिनों तक चलती है फूल बंगला सेवा, कुछ ही भक्तों को मिल पाता है सेवा का अवसर, जानिए परंपरा

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वृंदावन के ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में चैत्र शुक्ल पक्ष से 108 दिनों तक फूल बंगला सेवा होती है, जिसमें भगवान को ठंडक देने के लिए विशेष श्रृंगार किया जाता है. सभी तारीखें बुक हो चुकी हैं.

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बांके बिहारी मंदिर में शुरू हुई 108 दिनों की फूल बंगला सेवा.

हाइलाइट्स

  • बांके बिहारी मंदिर में 108 दिनों तक फूल बंगला सेवा होती है.
  • भगवान को ठंडक देने के लिए विशेष श्रृंगार किया जाता है.
  • फूल बंगले की सभी तारीखें पहले ही बुक हो चुकी हैं.

मथुरा: वृंदावन के ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में चैत्र शुक्ल पक्ष से भगवान बांके बिहारी फूल बंगले में विराजमान होकर अपने भक्तों को दर्शन देंगे. मंदिर में हर साल लगातार 108 दिनों तक फूल बंगला सेवा होती है. जहां गर्मियों में भगवान को ठंडक का अनुभव कराने के लिए यह विशेष श्रृंगार किया जाता है.
गर्मी शुरू होते ही लोग अपने-अपने आराध्य को शीतलता देने के लिए तरह-तरह के उपाय करने लगते हैं. बांके बिहारी मंदिर में भी भक्त गर्मी के मौसम में फूल बंगले की सेवा शुरू कर देते हैं. यह परंपरा हर वर्ष निभाई जाती है.

108 दिनों तक चलती है सेवा
मंदिर के सेवायत पुजारी शालू गोस्वामी ने Bharat.one से बातचीत में बताया कि फूल बंगला सेवा 108 दिनों तक चलती है. भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार ठाकुर जी के लिए फूल बंगला सजवाते हैं. पहले यह श्रृंगार सिर्फ शाम को होता था, लेकिन अब दिन में भी किया जाता है.
जिसमें ठाकुर जी को खुशबूदार फूलों में विराजमान किया जाता है. इसके लिए मथुरा, अलीगढ़, आगरा और बेंगलुरु से फूल मंगवाए जाते हैं. कुछ फूल विदेशों से भी आते हैं, जो विशेष बंगले में प्रयोग किए जाते हैं. रायवेल, गुलाब, गेंदा और चमेली जैसे फूल मुख्य रूप से उपयोग में लाए जाते हैं.

सभी तारीखें हो चुकी हैं बुक
पुजारी शालू गोस्वामी ने बताया कि इस साल फूल बंगले की सभी तारीखें पहले ही बुक हो चुकी हैं. जिन भक्तों को इस बार मौका नहीं मिल सका है, उन्हें अगले साल तक इंतजार करना होगा.

ठाकुर जी के ‘मनमोहन’ स्वरूप को सजाते हैं केवल बृजवासी
शालू गोस्वामी ने बताया कि मंदिर के मुख्य प्रांगण में सजने वाला बंगला आमतौर पर बाहर के कारीगरों द्वारा सजाया जाता है. लेकिन ठाकुर जी के ‘मनमोहन’ स्वरूप का श्रृंगार सिर्फ बृजवासी ही करते हैं. माना जाता है कि ठाकुर जी अपने इस स्वरूप को केवल बृजवासियों से ही सजवाना पसंद करते हैं.

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