आप किसी खुशी को बांधकर रख सकते हो? बहुत हंसी खुशी के बाद की उत्तेजना, आवेश कब तक मन में भर सकते हो? असहनीय हो जाएगा. सब से मुक्त हो कुछ देर शान्त होकर बैठने का मन करेगा. कभी ऐसा अनुभव हुआ? सुख में भी कष्ट है है-जब यह समझ आये तो समझो ज्ञानोदय हुआ. जिस दिन पता चले कि सुख उद्विग्नता और अशांति लाता है उसी दिन आप में वैराग्य का पदार्पण हुआ. अब आपको कुछ मौन और शांति चाहिए. हम अपनी संवेदनशीलता कहीं खो चुके हैं. तभी प्रसन्नता की, और अधिक पाने की लालसा बनी रहती है. कुछ और खुशी, कुछ और अच्छा, औरों से बढ़-चढ़ कर प्राप्त हो-यह व्यग्रता बनी रहती है. हम एक व्यग्रता से दूसरी व्यग्रता की ओर जाते रहते हैं. निराशा का दुख भी व्यग्रता है, प्रसन्नता का सुख भी व्यग्रता है. आप इस व्यग्रता के झूले में ही झूलते रहते हैं जीवन संघर्षरत ही रहता है.
वैराग्य सुख-दुख से परे
वैराग्य में बड़ी से बड़ी खुशी भी आपको उद्वेलित नहीं कर पाएगी. यही बुद्धत्व है. स्वर्ग का सिंहासन भी मिले, तो भी आप अपनी स्थिरता से डोलेंगे नहीं. यही उपलब्धि है. इस उपलब्धि का रहस्य है – वैराग्य. विधि-विधान और ध्यान विधि सीखी जा सकती है किन्तु वैराग्य सीखा नहीं जा सकता. यह तो समय के साथ जीवन में खिलता है अथवा गुरु के सानिध्य में संभव होता है. इसकी प्राप्ति का कोई अन्य उपाय नहीं. पुस्तकों में नहीं मिल सकता, केवल अनुभव ही वैराग्य प्रदान कर सकता है. इस ग्रह की श्रेष्ठतम ग्रहणीय प्रज्ञा वैराग्य है. किसी को भी विचलित किया जा सकता है किन्तु वैराग्य को नहीं. किसी का भी सौदा हो सकता है किन्तु वैराग्य का नहीं. वैरागी और स्थित-प्रज्ञ विचलित नहीं होते. केवल वैरागी ही सच्ची समृद्धि का धनी है. अन्य किसी को भी लोभ लुभा सकता है, हिला सकता है.
अपना मनोविश्लेषण
साधारण व्यक्ति बीस-तीस लाख के लालच में पद्च्युत हो कुछ भी करने को तैयार हो सकता है किन्तु वैरागी नहीं. अपना मनोविश्लेषण करो यदि कोई आपको कहे, आप झूठ बोल दो, तो एक करोड़ रुपये मिलेंगे.मन अनेकों तर्क प्रस्तुत कर देगा, उस कृत की वैधता के पक्ष में. “इसमें क्या है? हो सकता है, इस झूठ में किसी की भलाई हो, यदि इतना पैसा मिल गया, तो मैं मानव जाति की भलाई में लगा दूंगा, मुझे निज-स्वार्थ के लिए नहीं चाहिए, इतने पैसे से मैं पूरे विश्व -कल्याण में कुछ योगदान दे सकता हूं. एक बार एक पंडित ने किसी वेश्या को संत कबीर के विषय में कुछ झूठ बोलने को कहा. वह आत्मवान औरत थी अत: उसने इंकार कर दिया. किन्तु दो सोने की मोहरों का लालच देकर उससे कहा, कुछ करना नहीं, जब कबीर सत्संग में हों, तो इतना ही कहना है कि प्रिय! इतने दिन से हम दोनों मिले नहीं. जब उसने वैसा कहा, तो कबीर का प्रत्युत्तर था, अरे, मैं तो कब से तुम्हारी प्रतीक्षा में यहीं बैठा हूं तुम अब तक कहाँ थी?
आओ, बैठो, मैं भी तुम्हें याद कर रहा था
उस घटना ने तो कइयों को झिंझोड़ कर रख दिया. कबीर प्रति दिन सत्संग में अति सुन्दर, अद्भुत प्रवचन देते थे. एक भोलेभाले अनपढ़ जुलाहे के माध्यम से ब्रह्मज्ञान धरती पर उतर रहा था. पर बहुत से लोगों ने उस घटना के बाद कबीर के प्रवचन को में जाना और सुनना छोड़ दिया क्योंकि उनका कबीर से साथ केवल शब्दों तक ही सीमित था. कबीर के साथ आन्तरिक अंतरंगता नहीं थी. एक ही घटना ने उनके विचार फेर दिये. कबीर ने उनके व्यवहार का भी स्वागत किया. कबीर के शब्दों ने, आओ, बैठो, मैं भी तुम्हें याद कर रहा था उस वेश्या को स्तब्ध कर दिया. लोगों ने राजा को बताया. राजा ने कबीर को बुलाकर जाँच करवाई कि वह कोई ढोंगी हैं या संत? वेश्या और मौन न रह सकी और कुछ दिनों बाद स्वयं राजा के पास जाकर सारी घटना वर्णन कर दी. तब से उसके जीवन का रूपान्तरण हो गया.
सच जानने के लिए वैराग्य हो जाओ
वैराग्य से सच सामने आ जाता है. यदि किसी घटना का सच जानना हो तो पूर्ण वैरागी और शान्त हो जाओ. शान्त होना शक्ति है. वास्तविक आत्मीयता वैराग्य में ही घटती है. वैराग्य मन की नकारात्मक और नीरस मनोस्थिति नहीं. न ही संवदेनरहित स्थिति है. प्राय: लोग ‘वैरागी’ यानि रूखा सा साधू और भिक्षुणियों जैसा व्यक्तित्व-अलग थलग, शुष्क-समझते हैं. नहीं, नहीं, केवल वैराग ही परम प्रेम है. वैराग में आपकी अपने से अंतरंगता स्थापित होती है. जब आप अपने मन के डोरे संभाल लेते हैं तो आप किसी के भी साथ सौहार्द स्थापित करने में समर्थ हो जाते हैं. यदि आप अपने में समग्र हैं, अपने अंतस से संबद्ध हैं तो आप किसी के प्रति भी प्रेममय हो सकते हैं, किसी से भी बेहिचक, सहजता से संबंध बना सकते हैं. तब आलोचना, निंदकता और अनमनापन सब विलुप्त हो जाते हैं. तटस्थता और वैराग्य में अंतर है. आपकी तटस्थता, आपका विद्रोह-भाव किसी भावावेश के कारण है. वैराग्य आते ही आप केवल प्रेममय हो जाते हैं. केवल घनिष्टता बचती है दूजा कुछ नहीं.
