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स्वर्ग की अप्सरा थी रंभा, एक श्राप के कारण बना दी गई थी पत्थर की मूर्ति, जानें कब और कैसे हुई थी उत्पत्ति

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हाइलाइट्स

हिन्दू धर्म में वेदों और पुराणों का बड़ा महत्व है.इनमें अप्सराओं का भी उल्लेख मिलता है.

Apsara Rambha Ki Utpatti Kaise Hui : हिन्दू धर्म में वेदों और पुराणों का बड़ा महत्व है और इनमें अप्सराओं का भी उल्लेख मिलता है. यजुर्वेद के अनुसार अप्सराओं का वास पानी में होता है. प्रमुख 11 अप्सराओं में कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, पूर्वचित्ति, तिलोत्तमा और उर्वशी का नाम प्रमुख है. इसके अलावा रंभा को स्वर्ग की सबसे खूबसूरत अप्सरा के रूप में माना गया है. इसकी उत्पत्ति कब और कैसे हुई? आइए जानते हैं भोपाल निवासी ज्योतिष आचार्य योगेश चौरे से.

कब हुई रंभा की उत्पत्ति ?
हिन्दू धार्मिक ग्रंथ के अनुसार, अप्सराओं को अत्यंत सुंदर और आकर्षक बताया गया है, जिन्हें देख किसी का भी मन उन पर मोहित हो जाता था. अपसराएं कल्प-कल्पांतर, युग-युगांतर और जन्म-जन्मांतर की वासनाओं का प्रतीक हैं. इनमें सौंदर्य का प्रतीक मानी जाने वाली रंभा की उत्पत्ति ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को हुई थी. इसलिए इस दिन व्रत करने का विधान भी है. इसे रंभा तीज के नाम से जाना जाता है. इसके अलावा कार्तिक महीने के कृष्णपक्ष की एकादशी को भी रम्भा एकादशी व्रत किया जाता है.

कैसे हुई थी रंभा की उत्पत्ति ?
रंभा अपने आकर्षक रूप और सौन्दर्य के लिए जानी जाती थी और वह स्वर्ग ही नहीं तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी. पुराणों के अनुसार, रंभा की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी. उस समय 11 दैविक अप्सराएं प्रकट हुई थीं. जिसमें से रंभा को देव इंद्र ने अपनी राजसभा में स्थान दिया था.

रंभा को लेकर एक ​पौराणिक कथा भी है, जिसके अनुसार, जब रंभा ने विश्वामित्र की तपस्या को भंग करने का प्रयास किया तो उन्होंने उसे श्राप दिया था. इसके कारण रंभा को कई वर्षों तक पत्थर की मूर्ति बनकर रहना पड़ा था. इसके बाद भगवान और शिव और माता पार्वती की कृपा से रंभा को इस श्राप से मुक्ति मिली थी, जिससे उसने फिर से सामान्य शरीर पाया था.

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