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Garuda Purana Ki Baatein: गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के 13 दिन बाद तक मृतक की आत्मा का घर में ही वास होता है. आत्मा को मृत्युलोक से यमलोक पहुंचने में करीब एक साल का समय लगता है. जिस मृतक आत्मा के नाम का पिंड…और पढ़ें
ऐसा माना जाता है कि मृत्यु के बाद तेरहवीं तक आत्मा अपनों घर में सदस्यों के बीच ही रहती है. इसके बाद उसकी यात्रा दूसरे लोक के लिए शुरू होती है. उसके कर्मों का हिसाब किया जाता है लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर तेरहवीं भोज क्यों किया जाता है. इससे उस मृत व्यक्ति की आत्मा को क्या लाभ मिलता है. उज्जैन के पंडित आनंद भारद्वाज से इस बारे में जानते हैं.
क्यों जरूरी है पिंडदान?
उन्होंने बताया कि गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद 13 दिन तक मृतक की आत्मा का घर में ही वास होता है. आत्मा को मृत्युलोक से यमलोक पहुंचने में करीब एक साल का समय लग जाता है जबकि जिस मृतक आत्मा के नाम से पिंडदान नहीं किया जाता है, उसे तेरहवीं के दिन यमदूत जबरन घसीटते हुए यमलोक लेकर जाते हैं. ऐसे में यात्रा के दौरान आत्मा को काफी कष्ट उठाने पड़ते हैं, इसलिए मृतक की आत्मा की शांति के लिए तेरहवीं भोज को जरूरी माना गया है. गरुड़ पुराण में तो यहां तक कहा गया है कि यदि मृतक की तेरहवीं न कराई जाए, तो उसकी आत्मा पिशाच योनि में भटकती रहती है.
अगर ब्राह्मण भोज न करवाया जाए, तो…
हिंदू धर्म में हर कोई ब्राह्मण को भोजन करा सकता है. ब्राह्मण को भोजन कराने से अनेक प्रकार के कष्ट और दोष मिट जाते हैं लेकिन तेरहवीं के दिन ब्राह्मण भोज बहुत जरुरी माना गया है. इस दिन ब्राह्मण द्वारा सभी क्रियाएं कराई जाती हैं. ऐसे में अगर ब्राह्मण भोज न करवाया जाए, तो मृतक की आत्मा पर ब्राह्मणों का कर्ज चढ़ जाता है. गरुड़ पुराण के अनुसार, इससे मृतक की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है और उसे कष्ट भोगने पड़ते हैं.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Bharat.one व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

















