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Basant Panchami 2026 Hazrat Nizamuddin Dargah: आज देशभर में बसंत पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है और हर जगह पीला बसंत दिखाई दे रहा है. बसंत पंचमी का पर्व भारत गंगा-जमुनी तहजीब का बड़ा उदाहरण पेश करता है. दरअसल इस पर्व को केवल हिंदू ही नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी मनाते हैं. इस दिन दिल्ली की मस्जिद में कई कई कार्यक्रम किए जाते हैं. आइए जानते हैं इसके पीछे की वजह…
Basant Panchami 2026 Hazrat Nizamuddin Dargah: बसंत पंचमी का त्योहार ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है. इस दिन ज्ञान और संगीत की देवी मां सरस्वती को पीले रंग के फूल और वस्त्र अर्पित किए जाते हैं. माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हर वर्ष बसंत पंचमी का पर्व मनाया जाता है और इस बार यह शुभ तिथि आज है. बसंत पंचमा का पर्व केवल हिंदुओं में ही नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय में काफी धूमधाम से मनाया जाता है. हजरत निजामुद्दीन दरगाह से लेकर जामा मस्जिद में बसंत पंचमी पर कई कार्यक्रम किए जाते हैं. बसंत पंचमी के दिन दिल्ली की मस्जिद भी पीले रंग में सराबोर हो जाती है और गंगा-जमुनी तहजीब का बड़ा उदाहरण पेश करती है?
800 साल पुरानी परंपरा का आयोजन
बसंत पंचमी के दिन दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह पीले रंग से रंग जाती है. पीले वस्त्र पहनकर हर धर्म के लोग उत्साह और खुशी मनाते हैं. यह खुशी और उत्साह मां सरस्वती के पूजन के लिए नहीं, बल्कि एक शिष्य द्वारा अपने गुरु की खुशी के लिए मनाया जाता है और 800 साल पुरानी इस परंपरा का आयोजन आज भी होता है. बसंत पंचमी के दिन दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह में ‘सूफी बसंत’ मनाया जाता है और मस्जिद में आने वाले लोग पीली चादर भी चढ़ाते हैं.
शोक में थे हजरत निजामुद्दीन औलिया
परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात करें तो कहा जाता है कि 13वीं-14वीं शताब्दी के मध्य में हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने प्रिय भतीजे के निधन से शोक में थे. वे ना किसी से बात करते थे और ना ही ठीक से खाते थे. अपने गुरु की हालत अमीर खुसरो से देखी नहीं जा रही थी और वे इस समस्या का समाधान भी नहीं निकाल पा रहे थे. ऐसे में बसंत पंचमी के दिन उन्होंने कुछ महिलाओं को पीले वस्त्र और पीले फूलों के साथ देखा. पूछने पर महिलाओं ने बताया कि वे पीले रंग के फूलों का इस्तेमाल अपनी देवी सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए करते हैं.
दरगाह में सूफी बसंत मनाया गया
यह सुनकर अमीर खुसरो को लगा कि पीले फूलों को देखकर उनके गुरु भी खुश हो जाएंगे. उन्होंने पीली पोशाक पहनी और वे हाथ में सरसों के फूल लेकर गुरु के सामने पहुंच गए. अमीर खुसरो का ऐसा पहनावा देख हजरत निजामुद्दीन के चेहरे पर मुस्कान आ गई. उसी दिन से हर साल बसंत पंचमी के दिन दरगाह में सूफी बसंत मनाया जाता है. खास बात यह है कि सूफी बसंत का हिस्सा सिर्फ एक विशेष धर्म के लोग नहीं होते हैं, बल्कि ईसाई, सिख और हिंदू भी होते हैं. यही वजह है कि सूफी बसंत को भारत की गंगा-जमुनी तहजीब के नाम से भी पुकारा जाता है.
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पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें
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