Surya Grahan 2026: सूर्य ग्रहण का नाम सुनते ही घरों में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती है. कोई खिड़कियों पर पर्दे गिरा देता है, तो कोई पहले से ही पूजा-पाठ के नियमों की चर्चा करने लगता है. खासकर जब बात सूर्य को अर्घ्य देने जैसी रोज़मर्रा की धार्मिक परंपरा की हो, तो सवाल और भी गहरा हो जाता है. साल 2026 का सूर्य ग्रहण भी कुछ ऐसा ही सवाल लेकर आ रहा है क्या इस दौरान सूर्य को जल चढ़ाना चाहिए या नहीं? यह सवाल सिर्फ शास्त्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों के मन में भी है जो रोज़ सुबह सूर्य को जल अर्पित कर दिन की शुरुआत करते हैं. ग्रहण को लेकर समाज में कई धारणाएं हैं कुछ वैज्ञानिक, कुछ धार्मिक और कुछ पारंपरिक. इन्हीं सबके बीच यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि ज्योतिष और धर्मशास्त्र इस बारे में क्या कहते हैं. आइए जानते हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से.
सूर्य ग्रहण क्या है और क्यों माना जाता है खास?
सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच आकर सूर्य के प्रकाश को आंशिक या पूर्ण रूप से ढक लेता है. खगोलीय दृष्टि से यह एक सामान्य प्राकृतिक घटना है, लेकिन धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से इसे साधारण समय नहीं माना जाता.
शास्त्रों में ग्रहण काल को “संवेदनशील अवधि” कहा गया है. ऐसा माना जाता है कि इस दौरान सूर्य की ऊर्जा अस्थायी रूप से कमजोर हो जाती है और वातावरण में नकारात्मक प्रभाव बढ़ जाता है. इसी वजह से सूतक काल से लेकर ग्रहण समाप्त होने तक कई कामों पर रोक लगाई जाती है.
सूतक काल का महत्व
सूतक काल ग्रहण से पहले शुरू हो जाता है. इस समय पूजा-पाठ, भोजन पकाने और खाने से परहेज़ करने की परंपरा है. माना जाता है कि यह समय आत्मसंयम और मानसिक शुद्धता के लिए होता है.
रोज़ सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा
भारतीय संस्कृति में सूर्य को प्रत्यक्ष देव माना गया है. रोज़ सुबह तांबे के लोटे से सूर्य को जल देना सिर्फ एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक जीवनशैली भी है. ज्योतिष के अनुसार सूर्य को नियमित अर्घ्य देने से आत्मबल बढ़ता है, स्वास्थ्य बेहतर रहता है और कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है. कई लोग इसे आंखों की रोशनी, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच से भी जोड़कर देखते हैं. यही कारण है कि जब ग्रहण आता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही बनता है क्या इस दिन भी यह परंपरा निभानी चाहिए?
क्या सूर्य ग्रहण के दौरान अर्घ्य देना ठीक है?
पंडितों और ज्योतिषाचार्यों की मानें तो सूर्य ग्रहण की अवधि में सूर्य को अर्घ्य देना उचित नहीं माना जाता. कारण साफ है ग्रहण के समय सूर्य को सीधे देखना वर्जित है और अर्घ्य देते समय सूर्य की ओर दृष्टि जाना स्वाभाविक है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण काल में राहु-केतु का प्रभाव सक्रिय होता है, जिससे सूर्य की ऊर्जा ढकी रहती है. ऐसे में अर्घ्य देने से सकारात्मक फल की बजाय उल्टा प्रभाव पड़ सकता है.
तो क्या करें इस दौरान?
ग्रहण काल में सूर्य मंत्रों का मानसिक जाप किया जा सकता है. “ॐ सूर्याय नमः” जैसे मंत्रों का ध्यानपूर्वक स्मरण करना सुरक्षित और स्वीकार्य माना गया है. इसके अलावा ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देना शुभ होता है.
ग्रहण के बाद क्या है सही तरीका?
जैसे ही सूर्य ग्रहण समाप्त हो, स्नान करके घर और पूजा स्थल की शुद्धि की जाती है. इसके बाद सूर्य को अर्घ्य देना फिर से शुरू किया जा सकता है. अगर ग्रहण दोपहर से पहले समाप्त हो रहा हो, तो उसी दिन अर्घ्य देना शुभ माना जाता है.
यह माना जाता है कि ग्रहण के बाद सूर्य की ऊर्जा फिर से पूर्ण रूप में सक्रिय हो जाती है, इसलिए उस समय किया गया अर्घ्य विशेष फलदायी होता है.
