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Pahadi Spices: नींबू के अचार से लेकर सिलबट्टे की चटनी तक, इस छुटकू से मसाले के बिना फीका है पहाड़ों में हर जायका – Uttarakhand News


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Mustard Seeds Uses: उत्तराखंड के पहाड़ों में ‘राई’ सिर्फ तेल निकालने का जरिया नहीं, बल्कि रसोई की जान है. बागेश्वर और आसपास के इलाकों में दाल, कढ़ी और चटनी का स्वाद तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक उसमें राई का तड़का न लगे. यह जादुई चीज न केवल खाने का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि सेहत के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है. पाचन दुरुस्त करने से लेकर अचार को सालों तक ताजा रखने तक इसके कई ऐसे गुण है जो इसे खास बनाते हैं. जानिए क्या है इसकी खासियत और क्यों इसे पहाड़ों में इसे इतना माना जाता है.

बागेश्वर और आसपास के पहाड़ी इलाकों में सरसों के दाने यानी राई का यूज केवल तेल निकालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजाना की रसोई का अहम मसाला है. दाल, झोली, कढ़ी और हरी सब्जियों में राई का तड़का लंबे समय से लगाया जाता है. जैसे ही गरम तेल या घी में राई डाली जाती है, उसके चटकते ही खुशबू फैल जाती है और व्यंजन का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है. कुशल गृहिणी किरन पांडे बताती हैं कि बिना राई के तड़के के कई पारंपरिक व्यंजन अधूरे माने जाते हैं. खासकर सर्द मौसम में बनने वाले पौष्टिक भोजन में इसका खूब प्रयोग होता है.

पहाड़ में घरों पर बनने वाले अचारों में सरसों के दाने की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. नींबू, मूली, गाजर, मिर्च और लहसुन के अचार में राई डालना जरूरी माना जाता है. राई न केवल अचार को तीखा और चटपटा स्वाद देती है, बल्कि इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व अचार को लंबे समय तक खराब होने से भी बचाते हैं. स्थानीय महिलाएं साबुत राई के साथ पिसी राई का भी इस्तेमाल करती हैं, जिससे मसाला अचार में अच्छी तरह मिल जाता है. धूप में रखे जाने वाले पहाड़ी अचारों की खुशबू और स्वाद में राई की बड़ी भूमिका मानी जाती है.

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बनने वाली पारंपरिक चटनियों में भी सरसों के दाने का उपयोग किया जाता है. टमाटर, हरे धनिये, पुदीना और भांग के बीज की चटनी में राई का हल्का तड़का स्वाद को और उभार देता है. कई घरों में राई को हल्का भूनकर पीसा जाता है, और मसाले के रूप में मिलाया जाता है. इससे चटनी में हल्की तीखापन और गहराई आती है. ग्रामीण इलाकों में सिलबट्टे पर पीसी गई चटनी में राई मिलाने की परंपरा आज भी कायम है. यह स्वाद के साथ पाचन के लिए भी लाभकारी मानी जाती है.

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अब पहाड़ी क्षेत्रों में भी सरसों के दानों को पीसकर सरसों पाउडर बनाने का चलन बढ़ रहा है. इसका उपयोग सॉस, सलाद ड्रेसिंग और मैरिनेड में किया जाता है. सरसों पाउडर को तेल और सिरके के साथ मिलाकर तैयार ड्रेसिंग सलाद और उबली सब्जियों पर डाली जाती है. इससे स्वाद में खट्टा-तीखा संतुलन आता है. कई युवा रसोइये पारंपरिक मसालों को आधुनिक रेसिपी के साथ जोड़ रहे हैं. घर पर तैयार सरसों पाउडर बाजार के पैकेट मसालों से ज्यादा शुद्ध माना जाता है और इसकी खुशबू भी अधिक तीव्र होती है.

सरसों के काले और पीले दानों का उपयोग अलग-अलग तरह के व्यंजनों में किया जाता है. काले सरसों के दाने ज्यादा तीखे और तेज खुशबू वाले होते हैं, इसलिए इन्हें करी, कढ़ी और स्टिर-फ्राई में पसंद किया जाता है. पीली सरसों अपेक्षाकृत हल्की होती है. इसे पाउडर या पेस्ट के रूप में अधिक उपयोग किया जाता है. पहाड़ी रसोई में दोनों प्रकार के दाने उपलब्धता के अनुसार इस्तेमाल होते हैं. पारंपरिक व्यंजनों में स्वाद का संतुलन बनाए रखने के लिए मसालों का यह चुनाव अनुभव के आधार पर किया जाता है.

सरसों के दाने केवल स्वाद ही नहीं बढ़ाते, बल्कि सेहत के लिए भी फायदेमंद माने जाते हैं. इनमें ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो पाचन को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं. ठंडे इलाकों में रहने वाले लोग मसालेदार और गर्म तासीर वाले भोजन को प्राथमिकता देते हैं, जिसमें राई का तड़का अहम होता है. सरसों का उपयोग भूख बढ़ाने और गैस की समस्या कम करने में मदद करता है. इसी कारण भारी दाल और कढ़ी जैसे व्यंजनों में इसका प्रयोग जरूरी माना जाता है.

कई पारंपरिक पहाड़ी पकवानों और त्योहारों के भोजन में सरसों के दाने का विशेष उपयोग होता है. शादी-विवाह या सामूहिक भोज में बनने वाली दाल और सब्जियों में राई का तड़का अनिवार्य माना जाता है. गांवों में बड़े बर्तनों में पकने वाले भोजन में मसालों का संतुलन बनाए रखने के लिए राई डाली जाती है. इससे खुशबू दूर तक फैलती है और खाने का आकर्षण बढ़ता है. राई का तड़का भोजन को “जागृत” कर देता है, यानी स्वाद और सुगंध दोनों को सक्रिय करता है.

सरसों की खेती भी पहाड़ी कृषि का एक हिस्सा रही है. छोटे खेतों में उगाई गई सरसों से निकला तेल और दाने दोनों घरों में उपयोग होते हैं. स्थानीय उत्पादन होने से यह मसाला सुलभ और भरोसेमंद माना जाता है. कई परिवार आज भी अपनी उगाई सरसों को सुखाकर सालभर के लिए दाने सुरक्षित रखते हैं. इससे बाजार पर निर्भरता कम होती है, पारंपरिक स्वाद बना रहता है. खेत से सीधे रसोई तक पहुंचने वाली राई पहाड़ी खानपान की आत्मनिर्भरता और स्वाद दोनों की पहचान मानी जाती है.

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इस छुटकू से मसाले के बिना फीका है पहाड़ों में हर जायका, जानें इसकी खासियत


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https://hindi.news18.com/photogallery/lifestyle/recipe-mustard-seeds-rai-uses-health-benefits-uttarakhand-hill-kitchen-traditional-spice-local18-10147966.html

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