Gallbladder Cancer in India: 4 फरवरी को पूरी दुनिया वर्ल्ड कैंसर डे मना रही है. सड़कों पर जागरूकता रैलियां निकल रही हैं. सोशल मीडिया पर गुलाबी और नीले रिबन वाली पोस्ट शेयर हो रही हैं. लेकिन दिल्ली के एक अस्पताल के कोने में बैठा 51 वर्षीय अजय कुमार इन सबसे बेखबर हैं. उनके हाथ में एक फाइल है, जिसमें उसकी जिंदगी की एक्सपायरी डेट लिखी है. यह कहानी सिर्फ अजय की नहीं है, बल्कि भारत के उन हजारों परिवारों की है जो हर साल गोल ब्लैडर कैंसर यानी पित्त की थैली का कैंसर के क्रूर पंजों में फंस रहे हैं. बीते साल मई महीने में एक तंदुरुस्त आदमी आदमी को अचानक पता चलता है कि उसकी जिंदगी अब सिर्फ 9 से 12 महीने तक बची है. उस दिन से वह हर दिन तिल-तिल कर मर रहा है, क्योंकि न ही कीमो, न ही इमिनो और न ही सर्जरी कर डॉक्टर उसे आराम दे सकते हैं. जानिए इस बीमारी में मरीज की मौत कैसे निश्चित होती है और क्यों इसे इग्नोर न करें. जानिए गोल ब्लैडर का स्टोन कैसे कैंसर बनकर लीवर तक फैलकर आपको लील लेगा.
मई 2025: अचानक शुरू हुआ दर्द
अजय का जीवन किसी भी आम मध्यवर्गीय भारतीय जैसा था. सुबह दफ्तर जाना, शाम को अपने दो बच्चों एक बेटा जो नौकरी कर रहा है और दूसरा कॉलेज में बीटेक की पढ़ाई कर रहा है, के साथ वक्त बिताना. पिछले साल मई के महीने तक सब कुछ ठीक था. अचानक एक दोपहर अजय को पेट के दाहिने हिस्से में हल्का दर्द महसूस हुआ. उन्होंने इसे गर्मी या गैस की समस्या समझकर नजरअंदाज कर दिया.
गोल ब्लैडर कैंसर के लक्षण
लेकिन जब दर्द बढ़ने लगा, तो परिवार उन्हें पास के डॉक्टर के पास ले गया. डॉक्टर ने शुरुआती तौर पर अल्ट्रासाउंड (USG) लिखा. रिपोर्ट आई, तो उसमें पित्त की थैली में सूजन और कुछ पथरी (Stones) दिखाई दी. परिवार को लगा कि एक छोटा सा ऑपरेशन होगा और पथरी निकल जाएगी. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.
रिपोर्ट्स का वो सिलसिला और डॉक्टरों का ‘डेथ वारंट’
जब दर्द कम नहीं हुआ, तो डॉक्टरों ने सीटी स्कैन (CT Scan) और फिर एमआरआई (MRI) की सलाह दी. रिपोर्ट्स आने के बाद जो डॉक्टर अब तक मुस्कुराकर बात कर रहे थे, उनके चेहरे गंभीर हो गए. अजय को स्टेज-4 का गोल ब्लैडर कैंसर था, जो लीवर तक फैल चुका था. डॉक्टरों ने अजय की पत्नी को अलग ले जाकर जो कहा, उसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी. डॉक्टरों का कहना था, ‘कैंसर बहुत आगे बढ़ चुका है, अजय जी के पास अब ज्यादा से ज्यादा 9 से 12 महीने का वक्त है.’
एक हंसता-खेलता परिवार, जो अपने बच्चों की शादी और भविष्य के सपने बुन रहा था, अचानक गहरे सन्नाटे और मातम में डूब गया. घर की दीवारों पर अब बच्चों की हंसी नहीं, बल्कि दवाइयों की गंध और दबी हुई सिसकियां तैरती हैं.
भारत में ‘साइलेंट किलर’ क्यों है गोल ब्लैडर कैंसर?
गोल ब्लैडर कैंसर को भारत में ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इसके शुरुआती लक्षण जैसे पेट दर्द, अपच या पीलिया बहुत सामान्य होते हैं. लोग इन्हें गैस या पथरी समझकर टालते रहते हैं. जब तक कैंसर का पता चलता है, तब तक वह शरीर के अन्य अंगों को अपनी चपेट में ले चुका होता है.
अजय के केस में भी यही हुआ. डॉक्टरों के अनुसार, जब तक इस कैंसर में तेज दर्द शुरू होता है, तब तक इलाज की संभावनाएं बहुत कम हो चुकी होती हैं. भारत में इस कैंसर की ‘सर्वाइवल रेट’ दुनिया के कई अन्य देशों की तुलना में काफी कम है.
भारत के इन राज्यों में है सबसे ज्यादा खतरा
गोल ब्लैडर कैंसर का वितरण भारत में बहुत अजीब है. यह पूरे देश में एक समान नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि उत्तर भारत और पूर्वी भारत के राज्यों में इसके मरीज सबसे ज्यादा मिलते हैं.
भारत के किन-किन राज्यों में गोल ब्लैडर कैंसर सबसे ज्यादा होते हैं?
उत्तर प्रदेश और बिहार: गंगा नदी के किनारे बसे इलाकों (Gangetic Plains) में इस कैंसर का प्रकोप सबसे ज्यादा है.
पश्चिम बंगाल और असम: इन राज्यों में भी गोल ब्लैडर कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.
दिल्ली और हरियाणा: यहां भी जीवनशैली और प्रदूषण के कारण मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है.
क्या कहते हैं कैंसर एक्सपर्ट्स डॉक्टर
सफदरजंग के कैंसर विभाग के एचओडी राकेश अरोड़ा न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, नार्थ इंडिया में गोल ब्लैडर कैंसर के मरीज सबसे ज्यादा आते हैं. गंगा के पानी में भारी धातुओं (Heavy Metals) की मौजूदगी, मिट्टी में कीटनाशकों (Pesticides) का बढ़ता इस्तेमाल और पित्त की पथरी का लंबे समय तक इलाज न कराना इसके मुख्य कारण हैं. उत्तर भारत की महिलाओं में यह कैंसर पुरुषों की तुलना में अधिक देखा जाता है. यह बीमारी अमूमन थर्ड या फोर्थ स्टेज में ही पता चलता है. दुनिया में कहीं भी इस कैंसर का कोई इलाज नहीं है. हालांकि, अब इमिनोथैरेपी शुरू हो गया है. कुछ मामलों में टारगेट थैरेपी भी डॉक्टर देते हैं, लेकिन वह गोल ब्लैडर कैंसर में कितना कारगर होगा, इस पर अभी रिसर्च चल रहा है.’
कैंसर एक जानलेवा बीमारी है, जिससे हर साल लाखों लोग मर जाते हैं.
अजय का परिवार आज भी उम्मीद के सहारे जी रहा है. उनके बच्चे अब अपने पिता के साथ हर पल को कीमती मानकर जी रहे हैं. वर्ल्ड कैंसर डे पर अजय की यह मार्मिक कहानी हमें चेतावनी देती है कि शरीर के किसी भी असामान्य दर्द को हल्के में न लें. विशेषकर अगर आपको पित्त की पथरी की शिकायत है, तो उसे ‘सिर्फ पथरी’ समझकर न छोड़ें. नियमित जांच, संतुलित आहार और शुरुआती लक्षणों के प्रति सजगता ही वह एकमात्र रास्ता है, जिससे किसी और ‘अजय’ का परिवार इस तरह बिखरने से बच सकता है.
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