Economic Survey concern on Obesity: एक जमाना था जब देश को इंफेक्शन वाली बीमारियां कमर तोड़ रही थी. देश के किसी न किसी हिस्से में कुछ न कुछ संक्रामक बीमारियों का प्रकोप रहता ही था. इनमें हजारों लोगों की मौत भरी जवानी में हो जाती थी. आज इंफेक्शन वाली बीमारियों पर हमने लगभग काबू पा लिया लेकिन दूसरी ओर लाइफस्टाइल से संबंधित बीमारियों ने हमारे देश को जकड़ लिया है. आज भारत डायबिटीज कैपिटल ऑफ वर्ल्ड कहलाता है. हर साल 15 लाख लोगों को कैंसर से सामना करना पड़ता है. 4 में से एक वयस्क व्यक्ति को हाई ब्लड प्रेशर है तो नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक 24 महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष भारी भरकम मोटापे के शिकार है.
इधर डिजिटल क्रांति ने एक तरफ देश की तरक्की में चार चांद लगाया तो दूसरी तरफ जवानी में घुन लगा रहा है. कारण अधिकांश युवा सोशल मीडिया के गलत और अनावश्यक इस्तेमाल के कारण मानसिक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. 2026 के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने देश में तेजी से पनप रहे इन्हीं दो प्रमुख रोगों पर चिंता जाहिर की है. सर्वेक्षण में कहा गया है कि देश के युवाओं में मानसिक बीमारियां तेजी से बढ़ रही है साथ ही मोटापा देश पर बहुत बड़ा आर्थिक बोझ है. आखिर क्यों भारत इन दो मोर्चों पर पिछड़ रहा है? हमने देश के नामी डॉक्टरों से बात की ताकि यह समझा जा सके कि कैसे इस हेल्थ इमरजेंसी से निपटा जाए.
आर्थिक सर्वेक्षण में क्या कहा गया
2026 के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने मोटापा सहित गैर-संक्रामक बीमारियों पर एक स्पष्ट चेतावनी दी है. इसमें कहा गया है कि मोटापा, डायबिटीज, हार्ट डिजीज जैसी नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियां देश पर आर्थिक बोझ और इसके लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं. आगे भी इसके लिए व्यापक रणनीति बनाई जाएगी. आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि शिथिल जीवनशैली और गलत खान-पान इन सभी बीमारियों के लिए प्रमुख वजह है. वहीं बाजार से मिलने वाले पैकेटबंद फूड की दशा और दिशा को लेकर नीतिगत बदलाव की जरूरत है.
60 प्रतिशत मौतें इन्हीं बीमारियों से
मैक्स हेल्थकेयर में एंडोक्राइनलॉजी और डायबेट्स डिपार्टमेंट के चेयरमैन डॉ. अंबरीश मित्तल बताते हैं कि निःसंदेह आज मोटापा हमारे देश के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. पिछले एक-दो दशक में डायबिटीज, हार्ट डिजीज, कैंसर जैसी नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज ने देश के आर्थिक बोझ को बढ़ाया है. करीब 60 प्रतिशत मौतें इन्हीं बीमारियों के कारण होती है. इसके पीछे मुख्य कारण तेजी से बढ़ते शहरीकरण और खान-पान की गलत आदतें हैं. आज लोगों का शरीर शिथिल हो गया है जिसके कारण उन्हें ये बीमारियां लग रही हैं. खाने में कार्बोहाइड्रैट की ज्यादा मात्रा बहुत बड़ी चिंता का विषय है. कई अध्ययनों में कहा गया है कि कार्बोहाइड्रैट की थोड़ी मात्रा कम कर प्रोटीन की बढ़ा दी जाए तो इनमें से कई बीमारियों से वैसे ही निजात मिल सकती है. लेकिन हमारी आदत नहीं सुधर रही है जिसका परिणाम है आज हमारी 25 फीसदी वयस्क आबादी मोटापे से जूझ रही है. इन सबके लिए हमें अपनी खान-पान की आदत को सुधारना होगा. इसके लिए सस्ते पौष्टिक खाद्य पदार्थों की जरूरत है ताकि लोगों तक यह आसानी से उपलब्ध हो जाए.
इन बीमारियों की पहले से पहचान जरूरी
सी के बिड़ला अस्पताल में इंटरनल मेडिसीन की डायरेक्टर डॉ. मनीषा अरोड़ा ने बताया कि आर्थिक सर्वेक्षण में नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज पर फोकस किया गया है जो अच्छी बात है. इसकी हमें खास जरूरत थी क्योंकि अगर हम शुरुआत में ही मोटापे पर अंकुश लगा लेंगे तो आगे हमारे लिए यह बहुत फायदेमंद साबित होगा. इसके लिए मोटापे की शुरुआत में पहचान जरूरी है क्योंकि बहुत से लोगों में मोटापा उपर से नहीं दिखता लेकिन अंदर इसके कई कारक मौजूद होती है. युवा आमतौर पर हेल्दी दिखते हैं लेकिन होते नहीं है. ऐसे मामलों में समय पर जांच बहुत जरूरी है. आर्थिक सर्वेक्षण में मानसिक रोगों के लिए डिजिटल चश्का को प्रमुख दोषी माना गया है. इसके लिए स्क्रीन टाइम को सीमित करना होगा. माता-पिता को इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है. हमें हर रोज वॉक करने की धारणा बनानी होगी. बच्चों को खेल-कूद में प्रोत्साहन देना होगा. युवाओं को स्क्रीन टाइम कम कर नींद पर ध्यान देना होगा, तभी हमारे देश की तरक्की होगी.

मेंटल हेल्थ पर फोकस समय की मांग
फिक्की हेल्थकेयर को को चेयर और पारस हेल्थकेयर के डायरेक्टर डॉ. धर्मींद्र नागर कहते हैं कि आर्थिक सर्वेक्षण में इस बार मेंटल हेल्थ पर फोकस किया गया है. यह समय की मांग है क्योंकि जिस तरह से बच्चों और युवाओं में स्क्रीन एडिक्शन बढ़ रही है वह चिंता का विषय है. इसस एंग्जाइटी और डिप्रेशन की समस्या बढ़ने लगी है. लोगों में इससे साइलेंट प्रोडक्टिविटी रिस्क का खतरा बढ़ गया है. इन सबपर अंकुश लगाकर हमें अपनी नीति को एक्शन मोड में ले जाना होगा. इसे सिर्फ जागरुकता तक सीमित न रहकर एक्शन की ओर बढ़ना होगा. काउंसलिंग के ढांचे को मज़बूत करना होगा. माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर पाबंदी लगानी होगी और इसके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करना ज़रूरी है.
नींद और एक्सरसाइज बहुत जरूरी
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल ने बताया कि हमारे पास विरास में मिले हुए खराब जीन है जिनकी वजह से हमें कई कम्युनिकेबल और नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज मिले हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि आज हमारा लाइफस्टाइल बहुत खराब हो गया. गलत खान-पान और शिथिल जीवन मिलकर फैटी लिवर, मोटापा, डिस्लिपिडीमिया और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों को जन्म दे रही हैं. इसमें अगर आधुनिक जीवन का तनाव जुड़ जाए, तो हाई ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक और हृदय रोगों का खतरा और बढ़ जाता है. ऐसे में हमें हर रोज़ 7 घंटे की लगातार नींद, पारंपरिक भोजन और प्रतिदिन 30 मिनट की एक्सरसाइज करें, तो इस खतरों से बचा जा सकता है.
सरकार की ओर से उठाए गए कदम
सही चीज का आहारा कार्यक्रम -इसके तहत सरकार ने ऐसे कुछ प्रोग्राम बनाए हैं जिसमें लोग सही आहार का चुनाव कर सके. इसके लिए कुकिंग तेल में 10 प्रतिशत की कटौती, खेलो इंडिया और फिट इंडिया मूवमेंट, आज से थोड़ा काम कार्यक्रम, स्टॉप ओब्सिटी एंड फाइट ओब्सिटी कंपैन पर फोकस किया जा रहा है. वह मानसिक बीमारियों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने प्रज्ञता कार्यक्रम लॉन्च किया है जिसके तहत डिजिटल एजुकेशन के लिए समय सीमा या स्क्रीन टाइम को सीमित करने का प्रावधान है. वही ऑनलाइन सुरक्षा के लिए स्क्रीन टाइम को कम करने के लिए प्रोत्साहन कार्यक्रम भी चल रहा है. चीनी, नमक और फैट वाली चीजों से बनने वाले फूड पर स्पष्ट फूड लेबलिंग की व्यवस्था की जा रही है. साथ ही बच्चों को लक्ष्य कर बनाए गए विज्ञापनों पर प्रतिबंध की योजना बनाई जा रही है.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
https://hindi.news18.com/news/lifestyle/health-economic-survey-flags-rising-disease-burden-in-india-doctors-stress-urgent-lifestyle-changes-ws-n-10122709.html
