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Genetic Eyesight Problems: अगर माता-पिता की आंखों पर यंग एज में ही चश्मा लग गया है, तो उनके बच्चों को भी चश्मा लगने का खतरा होता है. डॉक्टर्स की मानें तो मायोपिया में जेनेटिक फैक्टर काफी देखा जाता है. हालांकि लाइफस्टाइल, स्क्रीन टाइम और आउटडोर एक्टिविटी भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं. छोटे बच्चों को स्क्रीन से बचाना बेहद जरूरी है.
Facts About Child’s Eye Health: आजकल छोटे बच्चों की आंखों पर भी चश्मा लगने लगा है. बच्चों के अधिकतर मामलों में मायोपिया यानी दूर की चीजें न दिखने के कारण चश्मा लगता है. मायोपिया की समस्या बच्चों में बहुत तेजी से बढ़ रही है और स्क्रीन टाइम को इसकी सबसे बड़ी वजह माना जाता है. हालांकि डॉक्टर्स की मानें तो मायोपिया में जेनेटिक फैक्टर भी अहम भूमिका निभाता है. अक्सर माता-पिता के मन में यह सवाल रहता है कि अगर उनकी आंखों की रोशनी कमजोर है, तो क्या इसका असर बच्चों पर भी पड़ता है? इस बारे में डॉक्टर से समझ लेते हैं.
नई दिल्ली के विजन आई सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर और ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट डॉ. तुषार ग्रोवर ने Bharat.one को बताया कि अगर पैरेंट्स को मायोपिया की वजह से यंग एज में चश्मा लगा है, तो इसका असर बच्चे की आंखों पर भी पड़ सकता है. इससे कम उम्र में बच्चे को मायोपिया की समस्या हो सकती है और उसे दूर की चीजें देखने के लिए चश्मे का सहारा लेना पड़ सकता है. मायोपिया कई मामलों में जेनेटिक होता है और इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. हालांकि आजकल स्क्रीन टाइम और आउटडोर एक्टिविटी भी कम हो गई हैं, जिसकी वजह से बच्चों की आंखों पर चश्मा लग रहा है.
डॉक्टर ग्रोवर ने बताया कि बच्चों की आंखों पर चश्मा लगने की वजह अधिकतर मामलों में मायोपिया होता है. मायोपिया में बच्चे को पास की चीजें साफ नजर आती हैं, लेकिन दूर की चीजें धुंधली दिखती हैं. ऐसी कंडीशन में बच्चों की पावर के अनुसार चश्मा लगाने की सलाह दी जाती है. कई बच्चों में प्लस पावर आने की समस्या भी देखी जाती है. इसकी वजह आंख का साइज छोटा होना या कॉर्निया में किसी तरह की समस्या होती है. ऐसी कंडीशन में बच्चे की आंखों में प्लस पावर आ जाती है. इसके लिए भी चश्मा लगाने की सलाह दी जाती है. सभी पैरेंट्स को समय-समय पर बच्चों की आंखों की जांच करानी चाहिए.
अब सवाल है कि बच्चों को चश्मे से कैसे बचाया जा सकता है? इस पर डॉक्टर तुषार का कहना है कि बच्चों की आंखों को जेनेटिक फैक्टर्स से नहीं बचाया जा सकता है, लेकिन स्क्रीन यूज को कम किया जा सकता है और आउटडोर एक्टिविटी को बढ़ाया जा सकता है. ज्यादा समय तक मोबाइल, टैबलेट या टीवी देखने, किताब को बहुत पास रखकर पढ़ने और कम रोशनी में पढ़ाई करने से आंखों की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है. ऐसे में जिन बच्चों में पहले से जेनेटिक रिस्क होता है, उनमें चश्मा जल्दी लग सकता है. जो बच्चे रोजाना खुली धूप में खेलते हैं, उनकी आंखों का विकास बेहतर होता है. प्राकृतिक रोशनी आंखों के लिए फायदेमंद होती है और यह मायोपिया के खतरे को कम कर सकती है.
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अमित उपाध्याय Bharat.one Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें
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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/health-can-weak-eyesight-of-parents-affect-their-children-doctor-tushar-grover-explains-genetic-risk-10096804.html
