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अगहन मास में क्यों नहीं खाना चाहिए जीरा? जानें क्या कहते हैं शास्त्र और आयुर्वेद

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Sagar News: धर्म ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, अगहन महीने में जीरा खाने से शरीर की पाचन शक्ति (अग्नि) बेहद सक्रिय हो जाती है. यह मास शीत ऋतु का होता है, इसलिए गर्म तासीर वाले पदार्थों का सेवन शरीर के संतुलन को खराब कर सकता है.

सागर. भगवान श्रीकृष्ण को अगहन माह 12 महीनों में सबसे अधिक प्रिय है, इसलिए सनातन धर्म में अगहन को सबसे श्रेष्ठ माह माना गया है. मान्यता है कि मार्गशीर्ष माह में भगवान का जाप करने और पूजन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है लेकिन यह महीना केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस महीने में तामसिक चीजों का सेवन करने की मनाही होती है. इसमें लहसुन, प्याज, जीरा, मसूर सहित अन्य चीजों को आयुर्वेद और धर्म के अनुसार नहीं खाना चाहिए. इसमें आज हम जीरा की बात करेंगे.

जीरा एक ऐसा मसाला है, जिसका उपयोग हर भारतीय रसोई में किया जाता है, खासकर हिंदू धर्म में जो लोग लहसुन, प्याज का त्याग कर देते हैं, उनके यहां जीरा का ही तड़का लगता है. यह सालभर का क्रम होता है लेकिन अगहन मास में जीरा इस्तेमाल करने से परहेज करना चाहिए. इसके बदले में हींग और काली मिर्च का उपयोग कर सकते हैं.

पूजा, व्रत और सात्विक आहार का विशेष महत्व
मध्य प्रदेश के सागर के पुजारी और विद्वत संघ के जिला अध्यक्ष शिव प्रसाद तिवारी Bharat.one को बताते हैं कि अगहन मास में पूजा, व्रत और सात्विक आहार का विशेष महत्व होता है. मौसम के हिसाब से खानपान का ध्यान रखने से हमारा स्वास्थ्य भी ठीक रहता है. बुंदेलखंड में कहावत है कि क्वांर करेला, कार्तिक दई, अगहन आंवला, पूष में मई. यह शीत ऋतु के महीने होते हैं, जिनमें इन चीजों को खाने से स्वास्थ्य को नुकसान होता है. ऐसे ही अगहन के महीने में जीरा खाना भी वर्जित बताया गया है. आयुर्वेद और पुराणों में बताया गया है कि इस महीने जीरा नहीं खाना चाहिए.

भगवान विष्णु को प्रिय सात्विक आहार
उन्होंने कहा कि धर्म ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, अगहन मास में जीरा खाने से शरीर की पाचन शक्ति (अग्नि) अत्यधिक सक्रिय हो जाती है. यह महीना शीत ऋतु का होता है, इसलिए गर्म तासीर वाले पदार्थों का सेवन शरीर के संतुलन को बिगाड़ सकता है. लोक मान्यता के अनुसार, अगहन मास में जीरा खाने से माता लक्ष्मी की कृपा कम हो जाती है. श्रीहरि विष्णु को सात्विक आहार प्रिय हैं जबकि जीरा तामसिक और उष्ण गुण वाला माना जाता है. आयुर्वेद के अनुसार, जीरा शरीर में पित्त दोष और उष्णता बढ़ाता है. इस मास में जीरे का सेवन सिरदर्द, त्वचा रोग या पाचन गड़बड़ी का कारण बन सकता है. यह न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक असंतुलन भी पैदा करता है, जिससे ध्यान और नींद प्रभावित होती है.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

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अगहन मास में क्यों नहीं खाते जीरा? जानें क्या कहते हैं शास्त्र और आयुर्वेद

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Bharat.one व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

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