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Nikah In Dargah Conditions : दरगाह में निकाह को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं कि यह शरीयत के मुताबिक जायज़ है या नहीं. अलीगढ़ के मौलाना ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए साफ किया कि निकाह एक इबादत है और इसके लि…और पढ़ें
मौलाना इफराहीम हुसैन ने बताया कि असल में निकाह के लिए किसी खास जगह की शर्त शरीअत में नहीं रखी गई है. यानी निकाह घर में भी जायज़ है, मस्जिद में भी और किसी खुले मैदान या गेस्ट हाउस में भी. बुनियादी शर्त यह है कि निकाह गवाहों की मौजूदगी में, मेहर की तयशुदा रकम के साथ और शरीअत के मुताबिक किया जाए. इस लिहाज से दरगाह एक ऐसी जगह है जहां लोग इबादत, दुआ और बरकत की नीयत से जाते हैं. अगर वहां पर निकाह किया जाता है और निकाह की तमाम शर्तें पूरी की जाती हैं तो शरीअत की नजर में वह निकाह जायज़ होगा.
मौलाना ने कहा कि दरगाह की फिजा में अक्सर सजावट, चढ़ावा और ऐसी रस्में जुड़ जाती हैं, जिनका सीधा ताल्लुक शरीअत से नहीं होता. इसलिए यह जरूरी है कि दरगाह पर निकाह करते वक्त किसी तरह की गैर-इस्लामी रस्म या अंधविश्वास शामिल न हो. दरगाह को सिर्फ एक जगह के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए, न कि उसे निकाह की बरकत का जरिया मानकर कोई नई रस्म ईजाद की जाए. शरीअत के मुताबिक निकाह को आसान और सादा रखना ही बेहतर है.
निकाह की शर्तें और मकसद हर जगह एक जैसी
मौलाना ने कहा कि पैगंबर मोहम्मद साहब ने भी यही तालीम दी है कि सबसे बेहतर निकाह वह है जिसमें दिखावा, फिजूलखर्ची और गैर-जरूरी रस्में न हों. लिहाजा अगर किसी के लिए घर या मस्जिद में निकाह करना मुमकिन न हो और वह दरगाह पर सादगी के साथ गवाहों की मौजूदगी में निकाह करता है तो यह भी सही और जायज़ है. यानी निकाह का मकसद और उसकी शर्तें हर जगह एक जैसी हैं, चाहे वह दरगाह हो, मस्जिद हो, घर हो या गेस्ट हाउस. जगह मायने नहीं रखती, बल्कि शरीअत की बताई गई हदें और शर्तें पूरी करना असल अहमियत रखता है.
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