Mahabharat: महर्षी वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत (Mahabharat) में कई ऐसे चरित्र हैं, जिनके बारे में लिखा और पढ़ा गया है. द्रौपदी हो, पांडव, कौरव या फिर कर्ण, हर किरदार की अपनी कहानी और अपनी परिस्थितियां हैं. लेकिन कुछ पात्र इस गाथा में ऐसे हैं, जिनके एक-एक निर्णय ने इस कहानी को एक नया मोड़ दिया है. भारतीय धर्म, सभ्यता और संस्कृति को दिखाने वाली इस कहानी में जितने बलवान पुरुष पात्र हैं, उतने ही रोचक और हैरान करने वाली स्त्री पात्र भी हैं. आज हम आपको महाभारत की एक ऐसी महिला के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी सुगंध के पीछे दीवाना होकर हस्तिनापुर के राजा ने इतिहास का वो फैसला ले लिया, जिसने इस महायुद्ध की नींव डाल दी थी. हस्तिनापुर वो राज्य था, जिसकी ताकत के आगे कोई नहीं टिक पाता था. लेकिन इस सुंदरी की एक शर्त की कीमत सिंहासन को ऐसी चुकानी पड़ी कि ‘अजेय’ भीष्म को हस्तिनापुर का राजा बनने के बजाए, आजीवन का ‘सेवक’ बना डाला. ये महिला थी मत्सगंधा, जिसे आगे चलकर सत्यवति के नाम से जाना गया.
जिससे हमेशा आती थी मछली की गंध
सत्यवति की वो सुंदरी थी, जिसकी शर्त ने भीष्म को आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने पर बाध्य किया. दरअसल सत्यवति एक मत्स कन्या थी और उसमें से हमेशा मछली जैसी गंध आती थी. इसलिए उसका नाम मत्सगंधा था. एक बार जब पाराशर ऋषि नदी पार करना चाहते थे, तो पिता के व्यस्त होने पर मत्सगंधा उन्हें नाव में बैठाकर नदी पार करने लगी. मत्सगंधा को देखकर ऋषि पाराशर मोहित हो गए थे, और उन्हीं के वरदान से वह अत्यंत सुगंधित स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गई थी. जिस स्त्री से मछली जैसी गंध आती थी, अब उसके शरीर से ऐसी सुगंध आने लगी कि हर कोई मोहित हो जाए. यही थी सत्यवति.
गंगा पुत्र देवव्रत बना ‘भीष्म’
दूसरी तरफ आर्यावर्त के राजा शांतनु का पहला विवाह गंगा से हुआ था और गंगा और शांतनु का पुत्र था देवव्रत. यही पुत्र महाभारत में आगे चलकर ‘भीष्म’ के नाम से जाना गया. भीष्म महाबलशाली और श्रेष्ठ योद्धा थे. जब हस्तिनापुर के राजा शांतनु को देवव्रत जैसा बेटा मिला, तो हस्तिनापुर के नए राजा की चिंता टल गई थी. भीष्म के राज्यअभिषेक की तैयारियां थीं. लेकिन इतिहास को कुछ और मंजूर था.
‘मैं प्रतिज्ञा करता हूं, आज से आजीवन ब्रह्मचारी रहूंगा.’ इस भीषण प्रतिज्ञा के बाद ही देवव्रत का नाम भीष्म पड़ा.
मेरी संतान ही बनेगी अगला राजा
एब बार राजा शांतनु वन में शिकार के लिए गए. इस सुंदर वन में उन्हें एक परम सुंदर युवती नजर आई, जिसके शरीर से बड़ी मनभावनी सुगंध निकल रही थी. राजा ने तुरंत शादी का प्रस्ताव उसके सामने रख दिया. इसपर युवती ने कहा, ‘मैं केवट पुत्री सत्यवती हूं. आपसे विवाह करना सौभाग्य की बात है. पर मेरी शर्त है कि मेरी संतान ही राज्य की उत्तराधिकारी बने.’ राजा शांतनु जानते थे कि भीष्म बड़ा पुत्र है और वह राजा बनने के योग्य है. राजा शांतनु ये शर्त सुन वापस आ गए. वो वापस तो आ गए, लेकिन उनका मन अब राज-काज में नहीं लगता. भीष्म के पूछने पर राजा ने बात टाल दी लेकिन एक मंत्री ने उन्हें सारा सच बताया कि राजा एक केवटराज की पुत्री से विवाह करना चाहते हैं, लेकिन उसकी शर्त है कि उसकी संतान ही राज्य की उत्तराधिकारी बने, जो राजा को स्वीकार नहीं.
पिता के सुख के लिए देवव्रत ने ली ‘भीष्म प्रतिज्ञा’
देवव्रत यानी भीष्म अपने पिता को उदास नहीं देखना चाहते थे. वो सत्यवती के पिता केवटराज के यहां पहुंचे और कहा, ‘मैं राजा शांतनु का पुत्र हूं. मैं राज्य के उत्तराधिकार से स्वयं को वंचित करता हूं. अब आप अपनी पुत्री का विवाह राजा से करा दें.’ लेकिन केवटराज और भी चतुर निकला. उसने कहा, ‘आपकी बात ठीक है, पर आपकी संतान अगर राज्य पर अपना अधिकार जताना चाहे तो मेरी पुत्री की संतान का क्या होगा?’ ये सुनते ही भीष्म ने वो भीषण प्रतिज्ञा ले डाली, जिसके बाद उनका नाम भीष्म पड़ा. देवव्रत ने कहा, ‘मैं प्रतिज्ञा करता हूं, आज से आजीवन ब्रह्मचारी रहूंगा.’ एक नवयुवक की ऐसी विकट प्रतिज्ञा ने सभी को हैरान कर दिया. ऐसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम ‘भीष्म’ हो गया. स्वर्ग के देवता भी उनकी इस भीषण प्रतिज्ञा के आगे नतमस्तक हो गए थे. भीष्म की इसी प्रतिज्ञा का परिणाम निकला की भीष्म के बजाए सत्यवति के पुत्रों ने आगे चलकर हस्तिनापुर का राज्य संभाला और इन्हीं में सिंहासन का महायुद्ध हुआ.
FIRST PUBLISHED : November 6, 2024, 19:02 IST
