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Mythology Story: ऋषि दुर्वासा एक बार देवताओं पर क्रोधित हो गए थे जिसके बाद उन्होंने ऐसा श्राप दे दिया जिससे देव लोक में कंगाली आ गई थी. आखिर ऋषि दुर्वासा को क्रोध क्यों आया था, आइए जानते हैं ये पौराणिक कथा.

दुर्वासा और इंद्र
हाइलाइट्स
- इन्द्र के अपमान से ऋषि दुर्वासा ने श्राप दिया.
- श्राप से स्वर्ग लोक की समृद्धि नष्ट हो गई.
- समुद्र मंथन से देवताओं ने अमृत प्राप्त किया.
Mythology Story: एक समय की बात है स्वर्ग लोक में देवताओं का वैभव चरम सीमा पर था. इन्द्र जो देवताओं के राजा थे ऐश्वर्य और विलासिता में डूबे रहते थे. वे अपने कर्तव्यों को भी भूल चुके थे. एक दिन ऋषि दुर्वासा स्वर्ग लोक में आए. वो अपने क्रोध के लिए जाने जाते थे. इन्द्र ने ऋषि का उचित सत्कार नहीं किया और उनका अपमान किया. इससे ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्होंने इन्द्र को श्राप दिया कि जिस धन-वैभव में डूबे रहकर तुम अपने कर्तव्यों को भूल गए हो वह सब तुमसे छिन जाएगा.
ऋषि दुर्वासा का श्राप
ऋषि के श्राप के प्रभाव से स्वर्ग लोक की समृद्धि नष्ट हो गई. देवराज इन्द्र सहित सभी देवता कंगाल हो गए. स्वर्ग लोक में लक्ष्मी का निवास समाप्त हो गया और वहां दरिद्रता छा गई. देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और वे असुरों से हारने लगे. स्वर्ग लोक की यह दुर्दशा देखकर सभी देवता चिंतित हो गए. उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि उन्हें इस संकट से मुक्ति दिलाएं.
समुद्र मंथन
भगवान विष्णु ने देवताओं को सलाह दी कि वे समुद्र मंथन करें. उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा जिसे पीकर वे अमर हो जाएंगे और उनकी शक्ति फिर से बढ़ जाएगी. देवताओं ने भगवान विष्णु की बात मानकर समुद्र मंथन किया. इस कार्य में उन्होंने वासुकि नाग को रस्सी और मन्दराचल पर्वत को मथनी बनाया. समुद्र मंथन के दौरान अनेक रत्न और दिव्य वस्तुएं निकलीं. सबसे अंत में अमृत निकला.
अमृत को लेकर देवताओं और असुरों में विवाद
अमृत को लेकर देवताओं और असुरों में विवाद हो गया. भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवताओं को अमृत पिला दिया. इससे देवता अमर हो गए और उनकी शक्ति फिर से बढ़ गई. उन्होंने असुरों को पराजित करके स्वर्ग लोक पर फिर से अपना अधिकार जमा लिया. इस प्रकार ऋषि के श्राप के कारण स्वर्ग लोक में जो दरिद्रता छा गई थी. वह समुद्र मंथन के द्वारा दूर हुई और देवताओं ने फिर से अपनी समृद्धि प्राप्त की.
यह कथा हमें सिखाती है कि हमें कभी भी अपने ऐश्वर्य और विलासिता में डूबकर अपने कर्तव्यों को नहीं भूलना चाहिए. हमें हमेशा ऋषि-मुनियों और महापुरुषों का सम्मान करना चाहिए. अहंकार और अभिमान मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं.
February 13, 2025, 12:54 IST
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