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Nagula Chavithi 2025 today significance and Nagula Chavithi Vrat Katha in Hindi | 12 नागों को समर्पित है नागुला चौथी, आज होगी सबसे बड़ी पूजा, कथाओं से जानें क्यों महत्वपूर्ण है यह पर्व

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Nagula Chavithi 2025: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को नागुला चौथी या नाग चतुर्थी या नागुला चविथी के नाम से भी जाना जाता है और यह पर्व दक्षिण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन नागदेवता की पूजा करने से कुंडली में राहु, केतु, और कालसर्प दोष का शमन होता है. आइए जानते हैं नागुला चौथी का महत्व और पौराणिक कथाएं…

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Nagula Chavithi Vrat Katha in Hindi: हिंदू धर्म में प्रकृति और इसके सभी जीवों के प्रति सम्मान और श्रद्धा का विशेष महत्व है. इस धर्म में गाय, कछुआ, सर्प आदि के पूजन का विशेष महत्व बताया गया है. वहीं, दक्षिण भारत में सर्प पूजा की जाती है, जिसे नागुला चौथी कहते हैं. यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि और दीपावली के चौथे दिन की जाती है यानी आज है. मान्यता है कि कई लोग इस दिन व्रत भी रखते हैं, जिसे अनंत, वासुकि और शेषनाग सहित 12 नागों को समर्पित किया जाता है. जिस तरह उत्तर भारत में नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है, उसी तरह दक्षिण भारत में नागुला चौथी मनाई जाती है. आइए जानते हैं नागुला चौथी से जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में…

नागुला चौथी का महत्व
नागुला चौथी, जिसे नाग चतुर्थी या नागुला चविथी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र व्रत है जो कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है. इस व्रत का विशेष महत्व नागदेवता (सर्पों) की पूजा और संतान-सुख, स्वास्थ्य, एवं परिवार की रक्षा से जुड़ा हुआ है.
दक्षिण भारत में किए जाते हैं अनुष्ठान
नागुला चौथी तिथि को आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारत के कुछ प्रमुख राज्‍यों में जगह-जगह व्रत और अनुष्‍ठान किए जाते हैं. लोग यहां नागदेवताओं की मूर्तियां स्‍थापित करके उनकी पूजा करते हैं. मान्‍यता है कि चीटियों की पहाड़ियों पर नाग देवताओं का भी वास होता है. इस दिन लोग चींटियों की पहाड़ियों पर आकर दूध चढ़ाते हैं और मिठाई अर्पित करते हैं.

नागुला चौथी की पौराणिक कथाएं
नागुला चौथी से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. पहली कथा के अनुसार, जब देवताओं और दानवों ने समुद्र मंथन किया, तो उस दौरान सर्पराज वासुकि को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जिसमें हलाहल विष निकला, जिसे भगवान शिव ने समस्त संसार की रक्षा के लिए ग्रहण किया. इससे उनका कंठ नीला पड़ गया और उन्हें नीलकंठ कहा गया. माना जाता है कि इस विष की एक बूंद धरती पर गिर गई थी. इस विष के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए मानवजाति ने सर्पों की पूजा शुरू की, जिससे नागुला चौथी पर्व की शुरुआत हुई.

नागुला चौथी की दूसरी कथा
एक दूसरी पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जिसमें राजा जन्मेजय और नाग देवताओं की कहानी बताई गई है. कथा के अनुसार, एक बार राजा जन्मेजय ने नाग जाति के विनाश के लिए सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया था. इस यज्ञ के प्रभाव से सभी सर्प और नाग यज्ञ की ओर खींचे चले आए थे. वहीं, नागराज तक्षक ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए देवताओं से मदद मांगी. मगर यज्ञ की शक्ति इतनी प्रबल थी कि इंद्र सहित अन्य देवता भी यज्ञ की ओर खिंचे जाने लगे थे.

भय से देवता और सर्पों ने ब्रह्माजी से सहायती मांगी. उन्हें ब्रह्माजी ने मनसा देवी के पुत्र अस्तिका से सहायता लेने की सलाह दी. मनसा देवी की आज्ञा पर अस्तिका ने सर्पमेध यज्ञ को रोक दिया और सभी नागों व देवताओं की रक्षा की. यह घटना नाग चतुर्थी के दिन हुई थी. तब से मनसा देवी ने आशीर्वाद दिया कि जो भी इस दिन सर्पों की पूजा करेगा और इस कथा का श्रवण करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी.

Parag Sharma

मैं धार्मिक विषय, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष उपाय पर 8 साल से भी अधिक समय से काम कर रहा हूं। वेद पुराण, वैदिक ज्योतिष, मेदनी ज्योतिष, राशिफल, टैरो और आर्थिक करियर राशिफल पर गहराई से अध्ययन किया है और अपने ज्ञान से प…और पढ़ें

मैं धार्मिक विषय, ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष उपाय पर 8 साल से भी अधिक समय से काम कर रहा हूं। वेद पुराण, वैदिक ज्योतिष, मेदनी ज्योतिष, राशिफल, टैरो और आर्थिक करियर राशिफल पर गहराई से अध्ययन किया है और अपने ज्ञान से प… और पढ़ें

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12 नागों को समर्पित है नागुला चौथी, कथाओं से जानें क्यों महत्वपूर्ण है यह पर्व


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