Udupi Krishna Matha : भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक धरती पर कई जगहें ऐसी हैं, जो सिर्फ पूजा के केंद्र नहीं, बल्कि लोगों की आस्था, प्रेम और भरोसे का आधार भी बनती रही हैं. कर्नाटक का उडुपी शहर ऐसा ही एक स्थान है, जहां हर साल लाखों लोग शांत मन, श्रद्धा और उम्मीद के साथ भगवान कृष्ण के दर्शन करने पहुंचते हैं. इसी शहर में स्थित है प्रसिद्ध श्री कृष्ण मठ, जो लगभग 800 वर्षों से भारतीय धार्मिक जीवन का एक जीवंत प्रतीक माना जाता है. यह जगह सिर्फ एक प्राचीन धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का ऐसा मजबूत स्तंभ है, जिसने इतनी लंबी अवधि तक अपनी पहचान को कायम रखा है. यह मठ आज एक बार फिर देशभर में चर्चा का केंद्र बन गया है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दौरे की शुरुआत यहीं से करने का निर्णय लिया है. वह यहां आयोजित हो रहे लक्षकंठ गीतापारायण कार्यक्रम में शामिल होंगे, जहां एक लाख लोग एक साथ गीता के श्लोक पढ़ेंगे. इस आयोजन की तैयारियां कई दिनों से चल रही हैं और पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में रंग चुका है. प्रधानमंत्री यहां आने के साथ कई महत्वपूर्ण कार्यों का शुभारंभ भी करेंगे, जिनमें सुवर्णतीर्थमंडप का उद्घाटन और प्रसिद्ध कनकनकिंडि के लिए स्वर्ण कवच समर्पण शामिल है.
ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर यह मठ इतना खास क्यों है, इसका इतिहास क्या कहता है और भारतीय आध्यात्मिकता में इसकी जगह इतनी ऊंची क्यों मानी जाती है.
उडुपी का 800 साल पुराना श्री कृष्ण मठ
उडुपी का श्री कृष्ण मठ सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि भक्ति, दर्शन और धार्मिक शिक्षाओं का बड़ा केंद्र है. इसकी स्थापना 13वीं शताब्दी में हुई थी और इसे बनाने वाले थे महान दार्शनिक जगद्गुरु माधवाचार्य, जो द्वैत दर्शन के प्रवर्तक माने जाते हैं. उन्होंने वेदों और उपनिषदों की सीख को लोगों तक सरल रूप में पहुंचाया, जिसके कारण उनका सम्मान आज भी बेहद ऊंचा है.
मूर्ति की दिशा अनोखी क्यों है
इस मठ की सबसे खास बात है भगवान कृष्ण की मूर्ति का पश्चिम की ओर मुख होना. आम तौर पर मंदिरों में देवता पूर्व दिशा की ओर होते हैं, लेकिन यहां उनका मुख पश्चिम में है. इसके पीछे एक प्रेरणादायक कथा जुड़ी है, जिसने इस स्थान को और विशेष बना दिया.
कनकदास और “कनकनकिंडि” की कहानी
उडुपी के कृष्ण मठ से जुड़ी सबसे भावुक और मार्मिक कथा है महान भक्त कनकदास की. समाज की कुछ कठिन परिस्थितियों के कारण उन्हें मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं थी. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और मंदिर के पीछे एक जगह बैठकर भगवान को पुकारा. कहते हैं कि उनकी अपार भक्ति से खुश होकर भगवान कृष्ण की मूर्ति घूम गई और उन्होंने झरोखे से कनकदास को दर्शन दिए.
आज उस झरोखे को कनकनकिंडि कहा जाता है, जो भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है. यह घटना बताती है कि सच्ची भक्ति किसी भी दीवार से टकराकर नहीं रुकती और भगवान के सामने हर इंसान बराबर है.
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा और विशेष आयोजन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब यहां पहुंचेंगे, तब पूरा परिसर हजारों भक्तों की आवाजों से गूंज उठेगा. इस यात्रा का मुख्य आकर्षण है लक्षकंठ गीतापारायण, जिसमें एक ही स्थान पर 1 लाख लोग एक साथ गीता पाठ करेंगे. इतनी बड़ी संख्या में होने वाला यह पाठ वातावरण में ऊर्जा और सकारात्मकता का एक अनोखा अनुभव देगा.
इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी सुवर्णतीर्थमंडप का उद्घाटन करेंगे, जिसे खास तौर पर भक्तों के लिए तैयार किया गया है ताकि वे शांत माहौल में पूजा कर सकें. वह कनकनकिंडि के लिए स्वर्ण कवच भी समर्पित करेंगे, जो इस ऐतिहासिक स्थल के महत्व को और बढ़ाता है.
क्यों माना जाता है यह स्थान इतना पवित्र
-यहां भक्ति और आध्यात्मिकता एक साथ मिलती है.
-इसका संबंध वेदों और उपनिषदों की शिक्षाओं से जुड़ा है.
-कनकदास की अनोखी कथा इसे मानवीयता और समानता का संदेश देने वाला बनाती है.
-माधवाचार्य जैसे महान दार्शनिक ने इसकी नींव रखी, जिससे यह ज्ञान का केंद्र भी बना.
800 वर्षों की परंपरा, भक्ति और संस्कृति को एक साथ देखने का मौका इस मठ में मिलता है, जो इसे भारत के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में शामिल करता है.
