Thong Bikini trend and its effect on health: आजकल भारत में थोंग बिकिनी बोल्ड और मॉडर्न फैशन ट्रेंड का दूसरा नाम बन गई है. समुद्री बीच हों या स्वमिंग पूल्स बॉलीवुड हीरोइनों से लेकर मॉडल्स, सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स और यहां तक कि फैशन ट्रेंड्स को फॉलो करने वाली सामान्य महिलाएं भी इस सबसे छोटे टू पीस स्विमवीयर को पहनना पसंद कर रही हैं. पारंपरिक बिकिनी या टू पीस से अलग यह पतली पट्टी या रस्सी से बनी बिकिनी होती है, जिसमें बहुत ही कम कपड़ा लगा होता है. विदेशों से चलकर भारत में पहुंचा यह स्टाइलिश स्विमवियर आज भले ही सबका फेवरेट बन गया हो, लेकिन क्या आपने सोचा है कि इसका सेहत पर क्या असर होता है?
थोंग बिकिनी को “ब्राजीलियन-कट” बिकिनी के रूप में भी जाना जाता है. इस बिकिनी को साइड में थोंग यानि पतली पट्टियों या रस्सियों के सहारे पहना जाता है. चूंकि इन रस्सियों को कसकर बांधा जाता है, ऐसे में कई बार ये त्वचा के लिए नुकसानदेह होने के साथ ही ये प्राइवेट पार्ट्स को भी नुकसान पहुंचाती हैं.
थोंग बिकिनी को लेकर विदेशों में हुई कई रिसर्च बताती हैं कि ढीले अंडरवियर्स के मुकाबले थोंग्स बिकिनी आपकी सेहत को ज्यादा प्रभावित करती हैं. खासतौर पर ये बैक्टीरियल वेजिनोसिस और यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन फैलाने में सामान्य अंडरवियर से आगे हैं. देखा जाता है कि थोंग्स और जी स्ट्रिंग गुदाद्वार के एकदम पास होते हैं जो कि यूटीआई फैलाने वाले बैक्टीरिया ई कोलाई को वल्वा तक पहुंचाने में मददगार होते हैं.
थोंग बिकिनी में बांधने के लिए पतली पट्टी या रस्सी होती है.
इसके अलावा अगर थोंग्स स्क्रैची या सिंथेटिक मेटेरियल की बनी होती है तो वेजाइनल बैक्टीरियल या फंगल इन्फेक्शन के लिए भी जिम्मेदार होती है. ये वल्वा, पेरिनियम और अनस में जलन पैदा कर सकती हैं. थोंग्स को कितना टाइट बांधना है, अगर इस चीज का ध्यान नहीं रखा जाता तो उस जगह पर रैशेज होने के साथ ही खुजली, जलन और त्वचा का छिलना आदि हो सकता है.
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डर्मेटोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. कबीर सरदाना कहते हैं कि थोंग बिकिनी वेस्टर्न कल्चर में ठीक है. वैज्ञानिक द्रष्टि से देखा जाए तो वेस्टर्न स्किन को सन टैन की जरूरत होती है. यही वजह है कि वे शरीर के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को सन एक्सपोजर देने की कोशिश करते हैं. जबकि भारतीय लोगों की स्किन पहले से ही पिग्मेंटेड होती है और उसे और ज्यादा टैन की जरूरत नहीं होती.
इतना ही नहीं समुद्र तटीय इलाकों में इसे पहनने का नुकसान ये भी है कि भारत की जलवायु में सूरज की रोशनी का ज्यादा एक्सपोजर सनबर्न का कारण भी बनता है. चूंकि सन्सक्रीन जैसे प्रोडक्ट भी समुद्री पानी में बहुत ज्यादा देर तक कारगर नहीं होते हैं. ऐसे में आमतौर पर ढके रहने वाला संवेदनशील हिस्सा सूरज की तेज रोशनी से प्रभावित होता है. समुद्री तटों पर केंकड़े, कीड़ों आदि के काटने की संभावना भी होती है.
वहीं कई रिसर्च बताती हैं कि जिस तरह नाड़े या टाइट इलास्टिक के इस्तेमाल को लेकर नेगेटिव अनुभव बताए जाते हैं उसी तरह थोंग को बांधने के भी लगभग यही नुकसान हो सकते हैं. ज्यादा कसावदार थोंग्स की वजह से त्वचा के छिलने और निशान बनने की संभावना ज्यादा रहती है.
हालांकि दिल्ली की एक जानी-मानी गायनेकोलॉजिस्ट कहती हैं कि अगर बिकिनी के लिए सबसे बेहतर कॉटन का कपड़ा, थोंग्स को बांधने का सही तरीका और वैजाइनल हाइजीन का ध्यान रखा जाए तो जरूरी नहीं कि थोंग बिकिनी से नुकसान हो ही.