भारत में होली का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन माइग्रेन के मरीजों के लिए यह समय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता. आंकड़ों के अनुसार, भारत की लगभग 15-20% आबादी माइग्रेन से प्रभावित है, जिसमें महिलाएं सबसे अधिक शिकार होती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि माइग्रेन कोई साधारण सिरदर्द नहीं है, बल्कि यह एक ‘न्यूरोलॉजिकल सेंसिटिविटी डिसऑर्डर’ है. होली के दौरान दिल्ली, जयपुर और उत्तर भारत के अन्य शहरों में होने वाला शोर-शराबा और प्रदूषण इस संवेदनशीलता को चरम पर पहुँचा देता है.
माइग्रेन और मस्तिष्क की संवेदनशीलता
तनाव के कारण होने वाले सामान्य सिरदर्द से अलग, माइग्रेन में जटिल न्यूरोलॉजिकल पाथवेज शामिल होते हैं. इसमें मस्तिष्क रोशनी, आवाज और गंध के प्रति अति-संवेदनशील हो जाता है. जब कोई व्यक्ति इन ट्रिगर्स के संपर्क में आता है, तो ट्राइजेमिनल नर्व से जुड़े दर्द के रास्ते सक्रिय हो जाते हैं. इसके कारण सिर के एक तरफ तेज धड़कन जैसा दर्द, मतली, उल्टी और रोशनी-आवाज से चिड़चिड़ाहट होने लगती है.
नारायणा हॉस्पिटल, जयपुर के सीनियर कंसल्टेंट, न्यूरोलॉजी, डॉक्टर नितिन भकाल बताते हैं, “यह आमतौर पर धड़कते सिरदर्द जैसा महसूस होता है, जो अक्सर एक तरफ होता है, और इसके साथ उल्टी, उल्टी की इच्छा तथा रोशनी व आवाज़ की संवेदनशीलता आ सकती है. कुछ लोगों को सिरदर्द शुरू होने से पहले दृष्टि संबंधी विक्षोभ दिखाई देते हैं, जिन्हें ऑरा कहते हैं.”
सिंथेटिक रंगों और गंध का ‘हमला’
डॉ. नितिन भकाल बताते हैं कि होली के उत्सव की शुरुआत से पहले ही ट्रिगर्स सक्रिय हो जाते हैं. बाजार में मिलने वाले सिंथेटिक रंगों में अक्सर केमिकल और कृत्रिम खुशबू मिलाई जाती है. जब ये रंग हवा में उड़ते हैं या चेहरे पर लगाए जाते हैं, तो इनकी तीखी गंध सीधे मस्तिष्क के उन हिस्सों को उत्तेजित करती है जो दर्द और भावनाओं को नियंत्रित करते हैं. इसके अलावा, होलिका दहन का धुआं और प्रदूषण इस स्थिति को और भी गंभीर बना देते हैं.
डीजे का शोर और नर्वस सिस्टम पर तनाव
होली की पार्टियों में बजने वाले हाई-डेसिबल डीजे सिस्टम माइग्रेन के मरीजों के लिए खतरनाक हो सकते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, माइग्रेन के रोगियों के ब्रेनस्टेम में ध्वनि के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता होती है. लगातार शोर सुनने से सुनने की क्षमता पर दबाव पड़ता है और नर्वस सिस्टम ‘हाई अलर्ट’ पर चला जाता है. लंबे समय तक इस शोर में रहने से मस्तिष्क अपना संतुलन खोने लगता है और दर्द का संकेत भेजने लगता है.
इसके अलावा मार्च के अंत तक उत्तर भारत में गर्मी और धूप काफी तेज हो जाती है. होली का जश्न आमतौर पर सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच चरम पर होता है, जब सूरज की रोशनी सबसे तेज होती है. तेज रोशनी रेटिना के माध्यम से मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करती है जो सिरदर्द से जुड़े हैं. इसे फोटोफोबिया कहा जाता है. रंगीन पानी और सफेद कपड़ों से परावर्तित होने वाली सूरज की रोशनी इस प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती है.
सिंथेटिक रंगों और गंध का ‘हमला’
डॉ. नितिन भकाल बताते हैं कि होली के उत्सव की शुरुआत से पहले ही ट्रिगर्स सक्रिय हो जाते हैं. बाजार में मिलने वाले सिंथेटिक रंगों में अक्सर केमिकल और कृत्रिम खुशबू मिलाई जाती है. जब ये रंग हवा में उड़ते हैं या चेहरे पर लगाए जाते हैं, तो इनकी तीखी गंध सीधे मस्तिष्क के उन हिस्सों को उत्तेजित करती है जो दर्द और भावनाओं को नियंत्रित करते हैं. इसके अलावा, होलिका दहन का धुआं और प्रदूषण इस स्थिति को और भी गंभीर बना देते हैं.
डीजे का शोर और नर्वस सिस्टम पर तनाव
होली की पार्टियों में बजने वाले हाई-डेसिबल डीजे सिस्टम माइग्रेन के मरीजों के लिए खतरनाक हो सकते हैं. डॉक्टरों के अनुसार, माइग्रेन के रोगियों के ब्रेनस्टेम में ध्वनि के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता होती है. लगातार शोर सुनने से सुनने की क्षमता पर दबाव पड़ता है और नर्वस सिस्टम ‘हाई अलर्ट’ पर चला जाता है. लंबे समय तक इस शोर में रहने से मस्तिष्क अपना संतुलन खोने लगता है और दर्द का संकेत भेजने लगता है.
इसके अलावा मार्च के अंत तक उत्तर भारत में गर्मी और धूप काफी तेज हो जाती है. होली का जश्न आमतौर पर सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच चरम पर होता है, जब सूरज की रोशनी सबसे तेज होती है. तेज रोशनी रेटिना के माध्यम से मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करती है जो सिरदर्द से जुड़े हैं. इसे फोटोफोबिया कहा जाता है. रंगीन पानी और सफेद कपड़ों से परावर्तित होने वाली सूरज की रोशनी इस प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती है.
डिहाइड्रेशन बनता है साइलेंट खतरा
मस्ती और नाच-गाने के बीच अक्सर लोग पानी पीना भूल जाते हैं. इसके बजाय, कोल्ड ड्रिंक, शराब या कैफीन युक्त पेय पदार्थों का सेवन बढ़ जाता है, जो शरीर से तरल पदार्थ कम करते हैं. जब शरीर में पानी की कमी होती है, तो रक्त की मात्रा कम हो जाती है, जिससे मस्तिष्क तक ऑक्सीजन का प्रवाह प्रभावित होता है. मस्तिष्क के ऊतक दबाव और रासायनिक असंतुलन के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं, जिससे माइग्रेन का दौरा पड़ सकता है.
क्या है ‘लेट-डाउन’ माइग्रेन?
दिलचस्प बात यह है कि कई बार माइग्रेन जश्न के बीच में नहीं, बल्कि उसके खत्म होने के बाद हमला करता है. इसे ‘लेट-डाउन’ माइग्रेन कहा जाता है. जश्न के दौरान शरीर में एड्रेनालिन और तनाव हार्मोन का स्तर ऊंचा रहता है. जैसे ही त्यौहार खत्म होता है और शरीर आराम की मुद्रा में आता है, हार्मोन के स्तर में अचानक गिरावट आती है, जो सिरदर्द को ट्रिगर कर देती है.

भारत में लगभग 15-20% लोग माइग्रेन से पीड़ित हैं. (Image PTI)
बिना दर्द कैसे मनाएं होली?
डॉक्टरों का कहना है कि माइग्रेन के मरीजों को होली से डरने की जरूरत नहीं है, बस कुछ रणनीतिक बदलाव करने होंगे:
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