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महाभारत: क्‍यों इस ऋष‍ि ने मछुआरे की बेटी से म‍िलन के लि‍ए द‍िन में ही कर दी रात? इसके बाद भी कैसे ‘कुंवारी’ रही वो

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Mabharat: महाभारत में ऋषि-मुन‍ियों से जुड़ी कई अनोखी कथाएं हैं. लेकिन एक कथा ऐसी भी है, जब एक ऋष‍ि ने अपनी कामाग्‍न‍ि के लिए द‍िन में ही रात कर दी थी. यही कथा ‘महाभारत’ के जन्‍म की भी कहानी है.

क्‍यों इस ऋष‍ि ने मछुआरे की बेटी से म‍िलन के लि‍ए द‍िन में ही कर दी रात?

ऋषि ऐसे मोह‍ित हुए कि इससे म‍िलन करने के ल‍िए उन्‍होंने द‍िन में ही रात कर दी. (Image- leonardo.ai)

Mabharat: महाभारत में कई ऐसी कहान‍ियां हैं, जिन्‍हें आज के समय में समझना या उसके पीछे के व‍िज्ञान को समझना आसान नहीं है. ऐसी ही एक कथा है ऋषि पाराशर से जुड़ी, जो एक मछुआरे की बेटी की सुंदरता पर कुछ ऐसे मोह‍ित हुए कि इससे म‍िलन करने के ल‍िए उन्‍होंने द‍िन में ही रात कर दी. इतना ही नहीं, इस कन्‍या के सौंदर्य पर वह कुछ ऐसे मोह‍ित हुए कि उससे संसर्ग करने के बाद उसे फिर से ‘कुंवारी’ होने का वरदान दे डाला. यही कथा ‘महाभारत’ के जन्‍म की भी कहानी है. आइए आपको बताते हैं इस कथा के बारे में.

मत्स्यगंधा के सौंदर्यवान चेहरे पर मोहि‍त हुए ऋषि
तेजस्वी ऋषि पराशर तीर्थयात्रा पर न‍िकले थे. घूमते हुए वे यमुना के पावन तट पर आए और एक मछुआरे से नदी के उस पार पहुंचाने के लिए कहा. वह मछुआरा उस समय खाना खा रहा था, तो उसने अपनी पुत्री मत्स्यगंधा से मुनि को नदी पार कराने को कहा. मत्स्यगंधा मुनि को नौका से नदी पार कराने लगी. जैसे ही मुनि पराशर की नजर मत्स्यगंधा के सौंदर्यवान चेहरे पर पड़ी तो उनके मन में काम जाग उठा और उन्‍होंने अपनी कामना मत्स्यगंधा के सामने रखी. मत्‍सगंधा ने सोचा, ‘मैंने मुनि की इच्छा के विरुद्ध कुछ कार्य किया तो ये मुझे शाप दे सकते हैं.’ इसलि‍ए उसने चतुराई से कहा‒ हे मुनि! मेरे शरीर से तो मछली की दुर्गन्ध निकला करती है. मुझे देखकर आपके मन में यह काम-भाव कैसे उत्पन्न हो गया?” मुनि चुप रहे, तब मत्स्यगंधा ने कहा, ‘मुनिवर! मैं दुर्गन्धा हूं। दोनों समान रूप वाले हों, तभी संयोग होने पर सुख मिलता है.’

मुनि पराशर की नजर मत्स्यगंधा के सौंदर्यवान चेहरे पर पड़ी तो उनके मन में काम जाग उठा.

‘अभी दिन है’ सुनते ही यमुना तट पर हुई रात
पराशर ऋषि ने अपने तपोबल से मत्स्यगंधा को कस्तूरी की सुगंधवाली बना दिया और उसका नाम सत्यवती रख दिया. ऐसे में सत्यवती ने उन्‍हें याद द‍िलाया कि ‘अभी दिन है’ तो उनका म‍िलन संभव नहीं है. पर तभी पाराशर मुनि ने अपने पुण्य के प्रभाव से कोहरा उत्पन्न कर दिया, जिससे तट पर अंधेरा छा गया. लगा मानो द‍िन में ही रात हो गई है. लेकिन सत्यवती एक कन्‍या था और वो जानती थी कि ये सही नहीं है. उसने कोमल वाणी में प्रार्थना की‒”प्रियवर! मैं कुंवारी कन्या हूं. यदि आपके सम्पर्क से मां बन गई तो मेरा जीवन नष्ट हो जाएगा.’ ये सुनते ही पराशर मुन‍ि ने कहा, ‘प्रिय! मेरा यह कार्य करने पर भी तुम कन्या ही बनी रहोगी. तुम्‍हारा कोमार्य भंग नहीं होगा.’ सत्‍यवती के साथ अपनी इच्‍छा पूरी कर पाराशर ऋषि चले गए.

सत्यवती ने उन्‍हें याद द‍िलाया कि ‘अभी दिन है’ तो उनका म‍िलन संभव नहीं है.

महर्षी वेद व्‍यास और ‘महाभारत’ का जन्‍म
दूसरी तरफ सत्यवती ने यमुना में विकसित हुए एक छोटे-से द्वीप पर अपने पुत्र को जन्‍म द‍िया. ये जो बच्‍चा पैदा हुआ, यह जन्‍म से काला था इसलि‍ए उसका नाम ‘कृष्‍ण’ रखा गया और द्वीप पर जन्म लेने के कारण उन्हें कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा. सत्‍यवति और पाराशर ऋषि का यही प्रतापी पुत्र महर्षी वेद व्यास हैं. आगे चलकर कृष्ण द्वैपायन तपस्या में लग गए और द्वापर युग के अंतिम चरण में वेदों का सम्पादन करने में जुट गए. वेदों का विस्तार करने से उनका एक प्रसिद्ध नाम ‘वेद व्यास’ पड़ गया. महर्षि वेद व्यास ने ही एक महान महाकाव्य की रचना की, जो आगे चलकर ‘महाभारत’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ. वहीं दूसरी तरफ बेटे को द्वीप पर छोड़ने के बाद सत्‍यवती फिर से कन्‍याओं की तरह रहने लगी और इसी सत्‍यवती की सुगंध पर राजा शांतनु मोह‍ित हो गए थे. सत्‍यवती और शांतनु के चले ही, राजा शांतनु के बड़े पुत्र भीष्‍म ने ‘भीष्‍म प्रत‍िज्ञा’ ली थी.

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