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शक्तिपीठों में देवी की सक्रिय शक्ति (शक्ति तत्व) की उपासना होती है. यहां भक्ति, योग और तंत्र तीनों धाराओं का संगम देखने को मिलता है. माना जाता है कि शक्तिपीठों के दर्शन से मनोकामनाएं पूर्ण, भय का नाश और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है. हिमाचल से आंध्र प्रदेश तक, ऐसे 4 शक्तिपीठ हैं, जिनके दर्शन करने मात्र से 51 शक्तिपीठ के दर्शन के बराबर पुण्यफल की प्राप्ति होती है.
सनातन धर्म में देवी के 51 शक्ति पीठों को विशेष महत्व दिया गया है. मान्यता है कि ये वही स्थान हैं, जहां देवी सती के शरीर के अलग-अलग अंग और आभूषण गिरे थे. इन्हीं स्थानों पर शक्ति पीठों की स्थापना हुई. हालांकि शास्त्रों में कहीं-कहीं 52 शक्ति पीठों का भी उल्लेख मिलता है, लेकिन आम तौर पर 51 शक्ति पीठ ही माने जाते हैं. हर शक्तिपीठ का अपना अलग महत्व, अलग कथा और अलग फल बताया गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में 4 ऐसे महाशक्तिपीठ भी हैं, जिनके दर्शन मात्र से 51 शक्तिपीठों के बराबर पुण्य मिलने की मान्यता है? इन्हें महाशक्तिपीठ या आदि शक्तिपीठ भी कहा जाता है.
पश्चिम बंगाल के कोलकाता में स्थित कालीघाट देवी काली का प्रमुख शक्तिपीठ है. मान्यता है कि यहां देवी सती के बाएं पैर का अंगूठा गिरा था. देवी यहां कालिका रूप में विराजमान हैं और भैरव को नकुशील कहा जाता है. यह स्थान तंत्र साधना और शक्ति उपासना का बड़ा केंद्र माना जाता है. कहा जाता है कि सच्चे मन से मां काली की पूजा करने से भय, बाधाएं और नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं और भक्तों को जीवन में साहस और आत्मबल की प्राप्ति होती है.
असम के गुवाहाटी में स्थित कामाख्या देवी मंदिर को सबसे रहस्यमय और शक्तिशाली पीठों में गिना जाता है. यह योनि पीठ है, जहां देवी सती का गर्भ स्थान गिरा था. यहां देवी की पूजा शक्ति और सृजन के प्रतीक के रूप में होती है. कामाख्या मंदिर में प्रतिमा नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक शिला की पूजा की जाती है. मान्यता है कि यहां दर्शन करने से इच्छाओं की पूर्ति होती है और साधकों को विशेष सिद्धियां प्राप्त होती हैं.
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हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वालाजी शक्ति पीठ अपनी अनोखी पहचान के लिए प्रसिद्ध है. यहां देवी की जिह्वा (जीभ) गिरी थी और आज भी मंदिर में प्राकृतिक रूप से जलती हुई अखंड ज्वालाएं दिखाई देती हैं. इन ज्वालाओं को देवी का स्वरूप माना जाता है. कहा जाता है कि यहां दर्शन करने से जीवन की परेशानियां कम होती हैं और रोग-शोक से मुक्ति मिलती है.
आंध्र प्रदेश में स्थित शैलपुत्री या भ्रमराम्बा देवी का मंदिर भी महा-शक्तिपीठ माना जाता है. मान्यता है कि यहां देवी सती की ग्रीवा यानी गला गिरा था. यह स्थान आध्यात्मिक शांति और मनोकामना पूर्ति के लिए जाना जाता है. भक्तों का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से की गई पूजा जीवन के बड़े संकटों से उबार देती है.
शक्तिपीठों की उत्पत्ति देवी सती और भगवान शिव की कथा से जुड़ी है. दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपमानित होकर देवी सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए. इस घटना से व्यथित होकर शिव तांडव करने लगे और सती के शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे. सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, जो पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर गिरे. जहां-जहां सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे, वहीं शक्तिपीठ स्थापित हुए.
शक्तिपीठ तांत्रिक साधना के प्रमुख केंद्र हैं. साधक यहां देवी की महाविद्या रूपों में उपासना करते हैं. कामाख्या (असम), तारा पीठ (बंगाल) जैसे शक्तिपीठ तंत्र साधना के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं. शक्तिपीठों ने भारतीय समाज को नारी शक्ति के सम्मान का संदेश दिया. ये स्थल लोककथाओं, पर्वों, मेलों और परंपराओं के माध्यम से समाज को एकजुट रखते हैं और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं.
शक्तिपीठ केवल मंदिर नहीं, बल्कि शक्ति, श्रद्धा और साधना के जीवंत केंद्र हैं. ये हमें यह स्मरण कराते हैं कि सृष्टि का संतुलन शक्ति के बिना संभव नहीं. भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्तिपीठों का महत्व सदियों से अटूट रहा है और आने वाले समय में भी रहेगा.
