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रिसर्च टीम ने एक नया रासायनिक कम्पाउंड बनाया है, जो अल्ज़ाइमर रोग के इलाज का एक संभावित तरीका हो सकता है. उनका काम कंप्यूटर-बेस्ड मॉडलिंग, सेल कल्चर के साथ लैब टेस्ट और पशुओं पर प्रयोग के संयोजन पर आधारित था.
दिमाग में मौजूद अतिरिक्त कॉपर से बंधकर बीटा-अमाइलॉइड प्लाक्स को तोड़ने के लिए साइंटिस्ट्स ने एक कम्पाउंड तैयार किया है. इसे अल्जाइमर के इलाज की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. ब्राजील की फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ ABC के साइंटिस्टों ने इसका इस्तेमाल चूहों में याददाश्त को बहाल करने के लिए किया है. इससे सूजन कम हुई. यह मौजूदा दवाओं की तुलना में अधिक आसान और सस्ता है. रिसर्चर्स मानव परीक्षण शुरू करने के लिए साझेदारियां खोज रहे हैं.
इस रिसर्च टीम ने एक नया रासायनिक कम्पाउंड बनाया है, जो अल्जाइमर रोग के इलाज का एक संभावित तरीका हो सकता है. उनका काम कंप्यूटर-बेस्ड मॉडलिंग, सेल कल्चर के साथ लैब टेस्ट और पशुओं पर किए गए प्रयोगों पर आधारित था. शुरुआती परिणाम पॉजिटिव मिले हैं. साइंटिस्ट्स अब फार्मास्यूटिकल कंपनियों के साथ मिलकर क्लिनिकल ट्रायल की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं.
अल्जाइमर के इलाज की और बड़ा कदम
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एफएपीईएसपी (FAPESP) के समर्थन से बनाए गए ये कम्पाउंड तैयार करना आसान हैं. यह माना जाता है कि ये अल्जाइमर रोग से पीड़ित लोगों के दिमाग में बनने वाले बीटा-अमाइलॉइड प्लाक्स को तोड़कर काम करते हैं. ये प्लाक्स तब बनते हैं जब अमाइलॉइड पेप्टाइड के टुकड़े न्यूरॉन्स के बीच जमा हो जाते हैं. इनसे सूजन होती है और दिमाग की कोशिकाओं को संतुलन बनाने में बाधा आती है.
एसीएस केमिकल न्यूरोसाइंस (ACS Chemical Neuroscience) में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार, ये कम्पाउंड कॉपर चेलेटर के रूप में कार्य करते हैं. बीटा-अमाइलॉइड प्लाक्स में मौजूद कॉपर से बंधकर ये अणु इन संरचनाओं को तोड़ते हैं. इससे बीमारी से जुड़े लक्षणों में कमी आई है. चूहों पर किए गए रिसर्च में पाया गया कि इस मॉलिक्यूल ने याददाश्त में गिरावट को घटाया. बायोकेमिकल विश्लेषण में बीटा-अमाइलॉइड प्लाक्स के पैटर्न में बदलाव भी देखा गया.
इस स्टडी को UFABC की नेचुरल एंड ह्यूमन साइंसेज सेंटर की प्रोफेसर गिज़ेल सेर्कियारो लीड कर रही हैं. उन्होंने बताया, “करीब एक दशक पहले, इंटरनेशनल स्टडीज ने दिखाना शुरू किया कि कॉपर आयन बीटा-अमाइलॉइड प्लाक्स बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं. यह पता चला कि आनुवंशिक म्यूटेशन और कॉपर को कोशिकाओं में ले जाने वाले एंजाइमों में बदलाव दिमाग में इसे जमा होने का कारण बन सकते हैं. इसी से ये प्लाक्स बनते हैं. इसलिए कॉपर होमियोस्टेसिस का नियमन अल्जाइमर के उपचार का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य बन गया है.”
इसी आधार पर रिसर्चर्स ने ऐसे मॉलिक्यूल बनाए जो ब्लड–ब्रेन बैरियर को पार कर सकें और बीटा-अमाइलॉइड प्लाक्स से कॉपर को हटा सकें. इसके लिए 10 मॉलिक्यूल तैयार किए गए और उनमें से तीन को चूहों पर एक्सपेरिमेंट के लिए आगे बढ़ाया गया. इनमें से एक ने बेहद मजबूत परिणाम दिखाए.
चूहों में क्या बदलाव देखे गए
चूहों पर किए गए प्रयोगों में कम्पाउंड ने न्यूरोइन्फ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव तनाव को कम किया. इससे हिप्पोकैम्पस में कॉपर संतुलन बेहतर हुआ, जो याददाश्त के लिए अहम है. इसके बाद चूहों ने नेविगेशन से जुड़े कार्यों में अच्छे नतीजे दिखाए. इसके अलावा, हिप्पोकैम्पल सेल कल्चर और चूहों दोनों में यह नॉन-टॉक्सिक पाया गया है. इस रिसर्च में यह भी पाया गया है कि कम्पाउंड अल्जाइमर के लिए दिमाग के सबसे ज्यादा जिम्मेदार क्षेत्रों तक पहुंच सकता है.
कब तक मिल पाएगी ये दवा?
सामान्य इलाज और दवाएं के लिए दस से पंद्रह वर्ष तथा विशेष गंभीर बीमारियों की दवाओं के लिए पांच से आठ साल का समय लगता है. इसमें से क्लिनिकल ट्रायल के तीन मुख्य स्टेज में लगभग छह से आठ साल लगते हैं. इन ट्रायल्स के पूरा होने के बाद दवा कंपनी नियामक संस्था जैसे भारत में सीडीएससीओ या अमेरिका में एफडीए को आवेदन देती है, जिसकी समीक्षा में छह से बारह महीने लगते हैं.
हालांकि गंभीर या जानलेवा बीमारियों जैसे कैंसर, एचआईवी या दुर्लभ रोगों की दवाओं के लिए फास्ट-ट्रैक, ब्रेकथ्रू थेरेपी या प्राथमिकता समीक्षा जैसी विशेष सुविधाएं दी जाती हैं. इनकी वजह से यह समय घटकर पांच से आठ वर्ष तक रह जाता है.
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https://hindi.news18.com/news/lifestyle/health-alzheimer-s-disease-will-be-eradicated-new-molecule-will-transform-treatment-sjn-9884949.html
