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भोलेनाथ ने साक्षात दिए थे यहां दर्शन, 8वीं सदी में शंकराचार्य ने किया था मंदिर का निर्माण, जानें मान्यता

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श्रीनगर गढ़वाल. यूं तो उत्तराखंड में भोलेनाथ के कई पौराणिक मंदिर हैं, लेकिन पौड़ी जनपद के देहचौरी स्थित मंजूघोष महादेव का एक ऐसा मंदिर है, जिसकी अपने आप में अलग महत्ता है. यहां भक्त दूर-दराज के क्षेत्र से दर्शन करने के लिये आते हैं. मान्यता है कि यहां जो भी भक्त पूजा-अर्चना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है. भक्त यहां मनोकामना लेकर पहुंचते  हैं. मंजूघोष मंदिर समिति के अध्यक्ष द्वारिका प्रसाद भट्ट ने Bharat.one को बताया कि मंजूघोष महादेव का मंदिर पौराणिक और ऐतिहासिक मंदिर है. उन्होंने बताया कि जब कोलासुर नाम के राक्षस का आतंक बढ़ गया था, तो राक्षस के भय से मुक्ति पाने के लिए मंजू नाम की एक अप्सरा ने इस स्थान पर भोलेनाथ की कठोर तपस्या की, जिसके बाद भोलेनाथ ने इसी स्थान पर उसको दर्शन दिये.

8वीं सदी में शंकराचार्य ने किया था मंदिर का निर्माण

भोलेनाथ ने कोलासुर नाम के राक्षस का वध कर उसके आंतक से मुक्ति दिलाई, तब से इस स्थान का नाम मंजूघोष पड़ गया. जिसके बाद 8वीं शताब्दी में शंकराचार्य ने यहां पर मंदिर का निर्माण करवाया. शंकराचार्य द्वारा मंजूघोष मंदिर का निर्माण करवाने के बाद इस मंदिर की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई, और तब से यहां लोग मनोकामनाएं मांगने के लिये आने लगे.  मान्यता है कि जो भी व्यक्ति यहां पूजा अर्चना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है.

संकन्द पुराण में मिलता है उल्लेख

स्कन्द पुराण में भी मंजूघोष महादेव मंदिर का उल्लेख मिलता है.  स्कन्द पुराण के अनुसार इस जगह पर पांच धाराएं बहती थी, जिसमें से एक मंजू नाम की धारा भी थी. उसी के नाम इस जगह का नाम मंजूघोष पड़ा. स्थानीय लोगों की मंजूघोष महादेव में अटूट आस्था है और लोग वर्ष में एक बार जरूर यहां दर्शन करने के लिये आते हैं. साथ ही लोग अपने गांव की खुशहाली के लिये भी यहां पूजा अर्चना करने के लिये आते हैं.

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Bharat.one व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.

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