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क्या आपको पता है छतरपुर की होली फाग गीतों के बिना अधुरी है? यहां लोग डीजे की धुन से ज्यादा फाग गीतों पर थिरकते हैं. फाग गीत गाने की सालों पुरानी परंपरा है. फाग उत्सव का दिन रखा जाता है जिसमें फाग गीत गाने वाले बुलाए जाते हैं. सभी लोगों को आमंत्रण भेजा जाता है. सभी लोग इकट्ठे होते हैं. इसके बाद ढोलक मंजीरा की धुन के साथ सुर में सुर मिलाकर फाग गीत गाए जाते हैं.
छतरपुर. जहां शहरों में लोग होली में डीजे की धुन में थिरकते हैं, वहीं छतरपुर में होली उत्सव पर फाग गाने की परंपरा है. जिस पर लोग गाते हैं और थिरकते हैं. ये सालों पुरानी परंपरा है. इसमें बुजुर्ग लोग फाग गीत गाकर होली उत्सव मनाते हैं. खजुराहो के कदारी गांव के दरवारी लाल दुबे Bharat.one से बातचीत में बताते हैं कि छतरपुर जिले में होली उत्सव पर फाग गीत गाए जाते हैं. इन गीतों के बिना होली त्योहार अधूरा माना जाता है.
15 साल की उम्र से फाग गीत गा रहे
दरवारी लाल बताते हैं कि 15 साल की उम्र से फाग गीत गाने सीख गए थे. हम मित्र लोग एक साथ बैठा करते थे तो ऐसे ही धीरे-धीरे गाने शुरू कर दिए. फाग गीत गाने का प्रशिक्षण कहीं से नहीं लिया. ये तो अंदर से ही हुनर है. मां सरस्वती की कृपा रही और बुंदेलखंड में जितने भी गीत होते हैं सब गाता हूं.
4 तरह की फाग गीत गाने की परंपरा
दरवारी लाल बताते हैं कि वैसे तो फाग की कई विधाए हैं. लेकिन छतरपुर जिले में 4 विधा की फाग गीत गाए जाते हैं. पहली झूलादार फाग होती है. दूसरी चौकड़िया फाग होती है. तीसरी छंददार फाग होती है. वहीं चौथी दौरउआ फाग होती है. इन सभी फाग गीतों में तर्ज का अंतर होता है. ये अलग-अलग लय से गाई जाती हैं.
फागुन महीने भर होती है फाग
दरवारी लाल बताते हैं कि फागुन के महीने में गांव की चौपालों, मंदिरों में फाग की अनोखी महफिलें जमती हैं, जिनमें रंगों की बौछार के बीच गुलाल-अबीर से सने चेहरों वाले फगुआरों के होली गीत फाग जब फिजा में गूंजते हैं तो ऐसा लगता है कि श्रृंगार रस की बारिश हो रही है. फाग के गीत सुनकर लोग झूमने पर मजबूर हो जाते हैं. सुबह हो या शाम गांव की चौपालों में सजने वाली फाग की महफिलों में ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार के साथ उड़ते हुए अबीर-गुलाल के साथ मदमस्त बुंदेलखंडी होली गीत गाने का अंदाज निराला है.
बुंदेली फाग के जनक थे कवि ईश्वरी
बताते चलें कि बुंदेलखंडी फाग के जनकवि इश्वरी को माना जाता है. उन्होंने यहां फाग की 32 विधायों को ईजाद किया था. जनकवि ईश्वरी की फागें आज भी बुंदेली कवि, गायक इस्तेमाल कर लोगों को सुनाते हैं. जंगला, पारकी फाग, चौकड़िया, दहक्वा,अधर की फाग, सिंघावलोकन और छंददार फाग. इन फागों में हंसी-ठिठोली के गीत कृष्ण और राधा के प्रसंग, राम के गीतों को भी गाते हैं.
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Dallu Slathia is a seasoned digital journalist with over 7 years of experience, currently leading editorial efforts across Madhya Pradesh and Chhattisgarh. She specializes in crafting compelling stories across …और पढ़ें
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https://hindi.news18.com/news/madhya-pradesh/chhatarpur-bundelkhand-fag-geet-holi-tradition-khajuraho-local18-10230954.html
